Sunday, 31 January 2016

आखिर कब

कहते हैं कि मेरा देश आज़ाद हुआ है
यूँ लगता भी है
कि ये लालकिला अपना है
ये ताजमहल ये मांडू ये पटना शहर अपना है
कि अपना है यूँ तो कश्मीर भी 
कन्याकुमारी और फूलों का शहर अपना है ,
ये राज अपना है तख़्त ओ ताज अपना है
सरकार अपनी है अधिकार अपना है ,
बरस बीते मगर न जाने कितने ये सोचते
ये ढूंढते करते खोज -बीन
कि जो लडे आजादी को वो कौन थे
किस प्रान्त किस भाषा के थे
भारत माँ के किस हिस्से किस आशा के थे ,
कि अब भी दिख जाता है कोई ये साबित करता हुआ
कि वो भी अपना है तब भी था
कि आज़ाद भारत ही जिसका अंतिम सपना था
कि जिसको कह देता है कोई विकृति से
कि अच्छा साबित करो
या फिर जाओ अपने प्रान्त और वहा ठोको दावा
और कोई दास हो उठता है आहत
होता है आहत एक और व्यक्ति भी
फिर उतार देता है चित्रपट पर
एक दास ...बेहद ख़ास दास की दास्तान सरेआम ,
आहत दास थोड़ी राहत थोड़ी संतुष्टि के साथ मुस्कुरा उठते है
हंसकर कहते हैं
मेरे देश तू आज़ाद दिखता तो है पर महसूस कब होगा ??

प्रेम

एक दफे हथेली पर एक ज़ख्म उभरा
हलकी लालिमा लिए पर सब्ज़
हलकी हलकी टीस देता
कभी मीठी तो कभी नुकीली सी
कुछ दिनों बाद उनमे एक बिंदु नज़र आया 
जैसे आँख हो किसी की
या फिर कोई बहुत छोटा सा कैमरा हो
जो हर पल कैद कर रहा हो मुझे
कि मेरे हर लम्हे पर जिसकी नज़र हो ,
एक रोज़ अचानक ही भूरा हो गया
फिर स्याह और स्याह फिर धीरे-धीरे सूख गया
रह गया उस जगह ज़ख्म की याद दिलाता
बस एक कौला मांसल गोल घेरा
और रह गयी कुछ बेहद टीसती यादें ,
तुम्हारा जाना इस कदर तो जरूरी नहीं था न
हमनफ़ज मेरे !!





कवितायेँ

खुद की मिटटी को रगड़कर बारिशों से
भाव गूंधा
फिर गढे कुछ शब्द कोमल ,
दोस्त लिखकर मुट्ठियों से भाप दी 
बन गया पर वो मुहब्बत
फिर गढ़ा विश्वास को
पर हो गया वो भी समंदर
अंत में मैंने गढ़ी ईमानदारी
पर बदलकर हो गया वो दर्द की तकलीफ जैसा ,
हंस पड़ी आँखें मेरी फिर हंस पडा बादल भी सारा
बह गया फिर गूंधी मिटटी का खजाना
मै भी कुछ-कुछ बह चली
रह गयी कुछ ,
बारिशों से अब मुझे है खौफ आता
प्रेम भी कुछ
कि मै बंटी दोनों में ही हूँ
हूँ फिर भी जीवत !!



शाम ने थोडा उचककर बादलों को छू लिया
फिर हुयी सिहरन अज़ब सी
बाँध तोड़े बह चला वो
ढह चला वो ,
रच दिए कितने ही सागर और नदी
जैसे कि लिखता कोई पागल कवि ,
यूँ ही तुम भी हो रहो मेरे लिए
बस बांह खोले आँख मूंदे
छू तो लो बस !!




उदासी को निचोड़कर भर लिया है बोतल में
जब-तब छुआ करती हूँ
तब भी जब मन हंस रहा होता है
और तब भी जब मौसम हंस रहा होता है ,
कभी - कभी दिन के खाली पन्ने पर कुछ उकेर देती हूँ
गुडहल का लिसलिसापन मिलाकर
या चांदनी की कुछ पंखुड़ियां चिपकाकर ,
कभी-कभी रात में भी धूप चुनती हूँ
तमाम सितारों के झुण्ड गर्मी में बदल देती हूँ
तमाम बेचैन बिखरी किरणों को कैमरे की फ़्लैश लाइट में ,
इन चुनिन्दा पलों में सहेजी उदासी खूब काम आती है
कि जब अक्स खुलकर मुस्कुरा रहा होता है
उदासी अंतस में सहारे सी हो जाती है !!





कई दफे उदासी बड़ी सूखी सी महसूस होती है
खुरदरी और दरकी हुयी भी ,
हर दफे तोड़कर रख लेती हूँ खुद में हर टुकड़ा उसका
साल बीतने तक भर जाता है हर एक गोशा 
पूरे गले तक ....पूरे नशे तक ,
इंतज़ार रहता है बस सावन का कि जो बरसे
तो भिगो दूं भर दूं हर दुकड़ा हर दरार
कि डूब जाए हर उदास लम्हा फिर रूमानियत में
उम्र भर के लिए
भिगोती हूँ भरती भी हूँ हर बार
न जाने कैसे पर रह जाता है फिर भी अछूता
एक कोना मन का ,
कि उसके लिए बारिश शायद बेवजूद है बेमायने है
कि उसके लिए राहत नहीं बूँद भर भी
इस उम्र में या अनेक उम्रों तक
कौन जाने !!





कल बेहद उदास थी रात
सागौन से टिकी पडी रही खामोश
उधेड़ती रही खुद को सितारों के क्रोशिये से
तब तक जब तक कि ज़ख्म जलने नहीं लगे
तब तक भी कि जब तक उनमे कुछ सोंधापन नहीं जागा ,
लिपटी रही तमाम मीठे लम्हाती सिक्कों के साथ
बीच-बीच में टूटी भी फिर खुद ही खुद को जोड़ा खुद से
खुद ही खुद का स्पर्श किया और उनींदी हो चली
भोर की राहतें सूरज की मुस्कुराहट में तब्दील हो उतर रही थीं
अलविदा कहने हौले से ,
रात ओस में बदल गयी और छुप गयी
नुकीली घास के नीचे
कि मिटटी बांह खोले थी उसे खुद में संजोने को ,
रात के दर्द भर हिस्सा जल उठा मिटटी का
पर वो हंस पड़ी माँ के से सुकून से और थामे रखा उसे दिन भर
देती रही थपकियाँ ... सहलाती रही दुलराती रही
फिर कर दिया विदा शाम ढलने पर ,
कि आज फिर बेहद उदास है रात
कि आज फिर टिकी पडी रहेगी सागौन से
चुपचाप ...... खामोश !!




उदास काला चश्मा

उसी शहर का उदास काला चश्मा है ये
जहां ख्वाब खिलते थे
इस कदर चमकीले कि नंगी आँखों से देख पाना
संभव नहीं था
इसलिए ही रात के कुछ उधार के धागों से बुना है इसे ,
जब - तब पहन लेती हूँ
जब उदास होना चाहती हूँ रोना चाहती हूँ
छिछली सतह पर दौड़ना चाहती हूँ
कि यादों के पैरहन में एक जोड़ा भर गुलाबी टांका
देखना चाहती हूँ
एक जोड़ी पैर जितना हाथों जितना
या फिर गहरी कटीली नज़रों जितना
कि जिसमे रस भर-भर कर तीखापन सजाया गया था ,
तब भी पहन लेती हूँ
जब कोई पुरानी तारीख किसी किताब के कवर से
मेरी तकलीफ में उतर जाती है
जब कोई पुराना दोस्त चुपचाप मेरे होने में
किसी और को तलाशने की कोशिश करते हुए भीग उठता है
कि कई दफे वो ज़िक्र किसी और का और उम्मीद किसी और की करता है ,
उदास काला चश्मा
कई मायनों में हमसफ़र से बेहतर है
कि ये कुरेदता नहीं कभी छीलता भी नहीं
साथ होने पर बस साथ भर होता है
कभी -कभी भावुक हो सहलाता है दुलराता है
जो ये भी न कर सके
तो बस मेरी पलकों को थामे रखता है
कम्पन की हर प्रक्रिया को छुपाकर
बनाये रखता है मुझे
गर्वीली सजीव जिंदादिल संतुष्ट स्त्री ,
ये मेरा उदास काला चश्मा
थोडा-थोडा अब भी रखता है मुझे
उसी शहर में
जहां चमकीले ख्वाब अब भी खिला करते हैं
पर जहां अब रात ने उधार देना बंद कर दिया है !!

दर्ज

सीने की मिट्टी पर दर्ज होती हैं हवाएं
दर्ज होती है तकलीफ
और एक किस्म की बेचारगी भी,
जब जिसम की आखें सूनी हो उठती हैं 
जब उंगलियों से फटे कागज की सी आवाज आती है
जब कोई चाह हो जाती है सोंधी -सोंधी सी
जब तमाम सांसे पकने लगती हैं रात के चूल्हे पर
जब तमाम शिकवे राहतों का सबब हो जाते हैं
जब गले के पास यूँ ही उभर आते हैं कुछ जख्म,
ठीक उसी वक्त हजारों मील दूर बैठा कोई कर रहा होता है
धूप से जवाब -तलब
और कर रहा होता है ख्वाहिश बारिशों की
बिना ये जाने कि किसी के सीने की मिट्टी बारिशों में भी
दरारों सी हो जाया करती हैं।।






मत करो

मत करो ,
यूँ मत करो कि न बचे कुछ बीच के सेतु सहित
बीच की उर्जा जहां नैराश्य का साधन बने
मतिहीन हो मत यूँ करो ,
रह भी जाए गर अगर रिश्ता कहीं टूटा हुआ
उधड़ा हुआ ..... रोता हुआ हर पल कहीं सहमा हुआ
फिर क्या हो हासिल
कि जिन्दगी पटकी रहे कदमो तले
और अहम् का साम्राज्य हो ,
कुछ नहीं रह पायेगा कुछ नहीं बच पायेगा
गर बच गया ये अहम् कुंठित ,
सो त्याग दो इसको अभी
और फिर करो रचना सुन्दर दृश्य की
कि हों जहां खुशियाँ असीमित
हो जहां सपने असीमित
और हो मुस्कान संग उपलब्धियों के
खिलखिलाती रौशनी का साथ हो
आगाज़ हो फिर एक निर्मल भाव का ,
मत करो ,
यूँ मत करो कि न बचे कुछ बीच के सेतु सहित
बीच की उर्जा जहां नैराश्य का साधन बने
मतिहीन हो मत यूँ करो !!

प्रेम कवितायेँ

रात की उनींदी आंखों ने कुछ गुनाह लिखे
कर दिया मुहब्बत के हवाले उसे
रख दिया वैसे ही वक्त की लाइब्रेरी में
जिंदगी के बाकीे अहम दस्तावेजों के साथ,
अब गुनाह भी इन प्यासी गलियों का किस्सा है
अब शर्म भी इस अजीम अहसास का हिस्सा है,
सुबह की धूप ने कुछ और सियाह कर दिया है उसे
फेर दी है मनहूसियत की कूची उसपर
बोझ फलक तक है
तकलीफ हलक तक
पर निजात दिखती नहीं कहीं,
कि यूँ ही डूबे रहना है तमाम उम्र तक
सिर झुकाए
दर्द का वाहियात बोझ उठाये
लिखते रहना है एक गीत मुहब्बत का
जिसकी एक पंक्ति इबादत की हो
एक माफी की
हमनफज मेरे।।



कुछ शब्द रात के माथे पर खुदे है
कुछ चाँद के सीने पर
कुछ सितारों के आँचल पर
तो कुछ परछाई के भीतर,
तासीर सबकी पर एक सी
थोड़ी गरम, थोड़ी तीखी
कुछ कसैली सियाह सी,
कि मानो इश्क ने खुद को
कहवे सा बना डाला है
पीती हूँ जिसको घूँट -घूँट मैं
पीता है जिसको घूँट -घूँट वो,
जिन्दगी की तरह जीने के लिए।।



शाम की हथेली में दर्द घिस दिया है
शाम पीली हो उठी
कि जैसे शादी में हल्दी की रस्म ,
शाम खुद ब खुद निखरने लगी 
शाम खुद ब खुद डरने लगी ,
शाम भ्रम में थी
दर्द और हल्दी के बीच ,
अमूमन तकलीफ कम हो जाती है हल्दी के बाद
पर यहाँ जायका कुछ कसैला निकला
कुछ क्या बेहद ,
शाम धीरे-धीरे स्याह हो उठी
मानो आज दर्द ने कब्ज़ा लिया हो
तमाम पीले सुकून को
जो कभी अमलतास सा होता था
तो कभी सूरजमुखी सा ,
शाम फिर भी हंस रही है
चाँद काला पड गया है !!