Friday, 5 February 2016

सौदा

आँखों की चिमनियों में धुआँ है 
कि रात चूल्हे का उधार काट लाई थी 
पुरजा पुरजा हवाओं की बदमिजाजी से लङा 
थका और उदासी के चीथङे में गमककर सो गया 
मिट्टी ढेरियों की शक्ल में लुढ़कती रही 
तब तक
जब तक कि मेरी रूह के रेशे ने उसे बांध न लिया
और मै खुद धङकनो की उधारियों का हिसाब लगाते बेसुध पङी हूँ
कि मुझे जब भी याद करना तो रेशम के कीड़े सा जिसे कोकून के लिए खौलते पानी के इम्तिहान से गुजरना होता है
अपनी सासों का सौदा करके।।

प्रेम यूँ भी

रात बुुन रही है सुंदर कविता
अलाव की लुकाठी थामे,
मिट्टी के सीने में सिहरन है
कि आसमान बस ढह पङने को है,
पहना दी जाएगी यही कविता
मिट्टी और आसमान के मिलन से उपजी
लथपथ भोर की पहली किरण को
रात की विरासत की तरह,
जिसे ओढ़ पूरा वो गुनगुनाती फिरे
किसी चिड़िया सी चहचहाती फिरे
और कर दे रूमानी धूप को भी,
शाम संधिकाल है
रात फिर होगी
अनेकों कविताओं के अदभुत प्रसव के लिए
कि अब तो सूरज को भी इंतजार है मीठी पीङाओं का,
प्रेम यूँ भी होता है
मेरे हमनफज।।

Thursday, 4 February 2016

प्रेम

वक्त थक रहा है उम्र का बोझ लादे
सफ़र लम्बा है शायद
कि अब वक्त को कूबड़ निकल आया है
कोई कोई आहट कराह उठती है
कोई टकरा जाती है
और उम्र का एक हिस्सा गिर जाता है वहीँ पर
चिपक जाता है सतह पर coaltar सा
कुरेदने में उम्र ज़ख्मी हो जाती है
वक्त उसे मायूसी व कुछ राहत से वहीँ छोड़ आगे बढ़ जाता है
ज़ख्म धीरे-धीरे ज़मीन की नमी में सीझता रहता है
पकता है परिपक्व होता है,
सुखाने की तमाम कोशिशे सूर्य को लाचार कर रही हैं
परन्तु ज़ख्म अब सूर्य पर साए सा है,
ज़ख़्मी उम्र मुस्कुराती है खिलखिलाती है
और अब तो करती है प्रेम भी
कि ज़ख्म अब उम्र के प्रेम का पैमाना हो गया है ,
शुक्रिया वक्त , तुम्हारी अनथक कोशिश
और तुम्हारे बदसूरत कूबड़ों के लिए
और इसलिए भी कि
प्रेम अब अपने सही अर्थों में सार्थक हो रहा है!!

मन

मन टूटता रहता है छोटे छोटे टुकड़ों में
कभी उदासी कभी एकांत तो कभी तकलीफ का बहाना लेकर
थोडा फलसफाना होकर,
उस रोज भी टूटा था 
जब गिट्टियों के लिए हुई लड़ाई हार गयी थी वो
और एकहथेली सांत्वना स्वरुप उसकी मुट्ठियों पर कस आई थी
उस रोज भी कि जब उसके चाय की प्याली
सरका दी गयी थी धीरे से किसी अज़ीज़ की ओर बिना उससे पूछे
मुस्कुराकर---- बदले में वो भी मुस्कुराई थी बढ़ी हथेलियों को पीछे खींचते हुए
चेहरे पर अचानक घिर आई अदृश्य परत को संभाले हुए भी
उस रोज भी कि जब सिनेमा देखना बस इसलिए मना हुआ कि वो लेट नाईट था
और २५ पारिवारिक लोगों में कोई एक ऐसा था जो अवांछित था
अप्रिय था---- पर किसके लिए ----- क्यों
उस रोज भी कि जब कोई मुस्कुराता सा उसकी तरफ देखते-देखते
किसी और की तरफ देखने लगा था
और उसकी पीड़ा पारे की तरह सीने से होते हुए आँखों तक नज़र आई थी
और फिर एकांत के थर्मामीटर में खामोश कैद हो गयी थी
अनेकों बार तब भी कि जब उसके बेहद छोटे-छोटे मामूली से सुख
परिवार की विराट मर्यादाओं के यज्ञ का ईधन हो गए थे,
ऐसे हर एक लम्हे में वो कछुआ हो जाती
दुबक जाती अपने महत्त्वहीन अपहचान अस्वीकार्य असम्मान के सुरक्षित मजबूत खोल के भीतर
पर मन ------वो चिड़िया हो जाता
इन तमाम अनगिनत लम्हों के छोटे-छोटे टुकड़ों को तिनकों सा कर बुन देता
अपने घोंसले की एक और पंक्ति
जिसके तमाम कमरों में से एक कमरा बुना जाना बाक़ी है अभी
कि जिसमे वो रखना चाहती है
बचपन से अब तक के तमाम उन लम्हों के पीड़ा जनित अपमान की जिज्ञासा
उनके तमाम प्रश्नवाचक चिन्ह
कि जब वो न रहे शायद तब कोई समझ सके , महसूस कर सके और देना चाहे
असंख्य भावपूर्ण प्रश्नों के ईमानदार जवाब
और पालना चाहे कोई चिड़िया
बना सके उसके लिए एक घोंसला मजबूत सुरक्षित और सम्मानजनक
और सुन सके वो तमाम गीत उससे
जो लिखे जा रहे हैं अनवरत दर्द के पन्नों पर
नमक की स्याहियों से !!

सुकून

सुकून टूटकर सितारों सा जा छिपा है
आसमां पर
कि मानो आसमां पर कोई मोरपंख छीजा पडा हो
लहूलुहान----- लम्बे अरसे से ,
ज़मीन की जड़ों से निकलकर कोई कीड़ा
लहू में फुंफकारता है
देह पीली पड़ जाती है
जबकी जहर का असर तो नीला होता है
महत्त्व भी नीला ही होता है
पर यहाँ रंगों का उलटफेर
दर्द की कवायद को कम नहीं करता
बढा देता है उलटे
कि जब मौसम इन्द्रधनुषों के निकलने का हो
ठीक उसी वक्त निकल आता है सूरज अपनी खोह से
अपने तीव्रतम ताप का पिटारा खोले
ठीक उसी वक्त तमाम घोंसले सुलगती राख का मटमैला आइना हो जाते हैं
और हो जाते हैं तमाम गीले ज़ख्म पपडियाये से
कि जैसे झरने से काँटों का कोई सोता फूट पड़े
कि जैसे हवाओं से साँसों का सम्पर्कसूत्र ही खो जाए
कि जैसे गुलाब से खुशबू का वास्ता ही न रहे
इस कदर की विभक्ति परिणामतः भयानक ही होती है
पर होती है ,
यूँ तो सुकून स्वीकार्य की परिणति है
संतोष का मित्र है
पर यही दो तत्व अक्सर वहां नहीं होते
जहां होता है प्रेम मेरे हमनफ़ज़ !!

उदासियाँ

उदासियों के अक्स से नकाब नोंचकर फेंक दी है
नज़र आते हैं पीड़ा से भरपूर कोटर कई
छिछला गयी चमडियों के फर्श
और ढेरों पसरी मनहूस काई,
इन्हें मिटाने की कोई शीघ्रता नहीं
वरन पाले जाने का जूनून है
एक और जिद्द भी
तकलीफों के गह्वर से सुकून के तलाश की,
इनका पाला जाना आवश्यक भी है
खुद को जीवंत कहे जाने का भ्रम सहेजने को
और मशहूर करने को खुद को खुद के जटिल अंतर्मन में,
बाह्य स्वप्न काईयों में तितलियाँ सहेजते हैं
अंतरतम के स्वप्न कोटरों में मधुमक्खी
दोनों मिलकर ही रचते हैं छिछलाई हुयी चमड़ियों में मीठी चंचलता
और ये सहज खेला अनवरत प्रवाहित होता है ढेरों कोकूनो की लुगदी के नीचे
ढका छिपा निरंतर इतिहास रचता,
उदासियाँ यूँ ही सम्मान के काबिल नहीं बनतीं
हमनफ़ज मेरे !!

Wednesday, 3 February 2016

इश्क

उलझने की हद तक इश्क करो
तब तक जब तक की उनकी गांठें मजबूत न हो जाएँ
और उन पर एक अलीगढ़ी ताला कसकर न जड़ा जा सके
जब तक उन्हें उन आलों में सुरक्षित न रखा जा सके
जहां से उन्हें उतार पाना लगभग नामुमकिन हो 
या फिर उस अलगनी से कसकर न बाँध दिया जाए
जो कमरे के एकदम किनारे के अंधेरों में कितने ही सालों से
चुपचाप लटक रही है ऐसे ही चुनिन्दा किस्सों को संभाले ,
इश्क करो तब तक जब तक कि
बौराये आम की टहनी सूख कर किसी नवेले चूल्हे में भभक न पड़े
या फिर कदम्ब के ढेरों फल इमली के स्वाद में न बदल जाएँ
तब तक भी कि जब तक धूप अपना मीठापन मुझमे बिखेरने से बाज़ आये
हवाएं अपनी आवारगी छोड़ शराफत से एक जगह थम जाएँ
नदी बहते-बहते हिमालय के शिखर तक जा पहुंचे
और मेरा आँगन एक बार फिर कच्ची मिटटी की आतिशी महक से भर जाए,
इश्क करो तब तक भी कि
जब तक कि मेरी रूह सात जन्मो का सफ़र तय कर वापिस मुझ तक न लौट आये
कि जब तक मौसमों का सलीका हिमाकत में न बदल जाए
कि जब तक फूलों की खुशबू अब्र में न घुल जाए
कि जब तक ये महुए का नशा इंसानी उम्र की औषधि न बन जाए
तब तक ----- तब तक इश्क करो मुझसे
मेरे बेचैन मन !!