Monday, 27 November 2017

भावचित्र

ये उस दौर का एक भावचित्र
जब धरती हुआ करती रही
आग का एक विशाल गोला
तपती ,दहकती , निर्लिप्त ,एकाकी ,
और जब बारिश पहली बार छलकी होगी
फिर और छलकी होगी
फिर बरसी होगी बेहिसाब
टूट पड़े होंगे रेले
और छन्न से गूंजा होगा संगीत
सरगम का पहला सुर
पहली धुन
और फिर बजता ही चला गया होगा
उन्मत्त बूंदों के सतरंगी प्रवाह में
नाच उठा होगा मन मयूर
आत्मा तृप्त हो प्रमुदित हुयी होगी
जग बौराया होगा
गगन मुस्काया होगा
अहा ....अद्भुत ....
आंख मीचे मुदित मगन हो करें कल्पना !!

बहने

बहनें जरूरी होती हैं
लड़ने झगड़ने शिकवे शिकायतों 
रूठने मनाने व् फिर लड़ने के लिए
सब्र आजमाने बेफुजूल सुनाने
कुछ लम्हें उनके चुराने कुछ अपने बनाने के लिए
बहनें जरूरी होती हैं ,
मन का भेद कहने
थोडा उनके हिस्से को बांटने अपनी बंटाने
दुःख सुख साझा करने
हौसलों को थामे रखने
किसी से कहीं भी कभी भी लड़ भिड जाने के लिए
बहनें जरूरी होती हैं ,
बहनें जरूरी होती हैं
कि बहनें रूह का आधा हिस्सा होती हैं
बचपन का पूरा किस्सा होती हैं
रात के अँधेरे में करती चुहलबाजियाँ
सहेलियों में बघारी शेखियां होती हैं
फिर आम का अचार चटपटा सा प्यार
बूंदी का गर्म लड्डू और चोरी का समोसा होती हैं ,
हो कोई भी त्यौहार या फिर हो रविवार
वो साथ का खज़ाना
यौवन का हर अफसाना
एक थाली का खाना संग गुनगुनाना
बोरसी की आग बेसुरा सा राग
कच्चा अमरुद खट्टी सी इमली या बडका तालाब
रजाई की गर्मी बिस्तर का आधा साइड
दिल से थोड़ी वाइड
पापा की दुलारी मम्मी की रानी बिटिया
मेरे जलन की पुडिया होती है ,
पर पराई इस दुनिया में जो सबकुछ अपना बना दे
मन को सज़ा दे
जो खूबसूरत तसल्ली सी लगे
अजनबी लोगों में अपनी सी लगे
वो कस्तूरी होती हैं
बहने जरूरी होती हैं !!

हो सकता है

राख से रचा फूल
आग में पकी कविता
हो सकती है ,
हो सकता है 
दूध का चन्द्रमा बनना
और सूरज का होना रेत ,
पहाड़ का मिटटी बनना भी मुश्किल नहीं
न ही नदी का सूखकर कुछ जगह उधार देना
अगर बोना हो उसमे गुलाब
उगानी हो नज़्म ,
एक हरे आसमान की कल्पना भी नामुमकिन नहीं
महसूसनी हो गर वहां समन्दर की आत्मा
देखना हो ढेरों बत्तखों का झुण्ड ,
तितलियों को मौसम का प्रेम भी कह सकते हैं
जो बिखरा होता है उनके पंखों पर
उड़ते हुए कभी कभी छिटक भी जाता है
जैसे छिटक जाती है रोली टीका करते समय
या जैसे छिटक जाता है सिन्दूर भरते हुए कोई सूनी मांग ,
ये सब उतना ही संभव है
कि जितना संभव है
आलमारी में पड़ी पुरानी किसी डायरी का अचानक हाथ लगना
पीले पड चुके पन्नों में से किसी एक का गुलाबी हो जाना
उस पर बार बार तराशकर लिखे गए एक नाम का पिघलकर गीला हो जाना
और हो जाना नज़रों का पहले झिलमिल
और फिर क्रमशः आत्मा का बोझिल हो जाना !!

छोटी बच्ची

मै आज भी
उस दौर में हूँ
जब तितली के परों पर
खुशबुओं से नज़्म लिखा करते थे ,
जब हवाओं पर उड़े उड़े फिरा करते थे 
जब आंगन में चूल्हे होते थे
जब पेड़ों में झूले होते थे ,
जब माँ की गोद लिहाफ सी हुआ करती थी
जब कुनमुनाई सी नींद बाहों में गुजरती थी
जब सरसों के तेल तालू पर थपक थपक कर रखे जाते थे
जब अमरुद गाजर का हलवा भूनी मूंगफली
साथ बैठकर खाते थे
वो अन्ताक्षरियों का वक्त था
पो शम पा और गुड्डे गुड़ियों का वक्त था ,
मुझे फिर से उसी वक्त में बस लौट जाना है
मुझे फिर से अपनी माँ की छोटी बच्ची भर
बन जाना है |

सुनो साथी

सुनो साथी
तुम मत बदलना
कि बदलती हैं स्त्रियाँ प्रेम में 
पुरुष नहीं ,
जब तुम हमें टोकते हो बांधते हो
हम उसे प्रेम मान लेते हैं
जब तुम हमारे कपड़ों को संतुलित करते हो
हम उसे भी प्रेम मान लेते हैं ,
हमें तो वो भी प्रेम ही लगता है
जब तुम हमारा किसी से बात किया जाना बाधित करते हो
या जब तुम ये कहते हो
तुम अपनी सहेली से ज्यादा सभ्य व् सुसंस्कृत हो
तुम ज्यादा परिपक्व हो
हमारे पुराने ढर्रों को भी तुम स्वाभाविक मान लेते हो
कमतर होने को सामाजिकता ,
प्रेम तो हम स्त्रियाँ उसे भी समझ लेते हैं
जब बीमारी में तुम पानी का गिलास पकडाते हो
या पूछते हो डॉक्टर के पास चलना है ?
या जब कहते हो
ठीक लग रहा हो तो ज्यादा कुछ नहीं खिचडी ही बना लो ,
हमारे जीवन पर आदतों पर आधिकारिक नियंत्रण
सामान्य है तुम्हारे लिए
कि ये तो होता ही है
हम स्त्रियाँ भी प्रेम की खुशफहमियों का जाल ओढ़े
स्वाभाविक मान लेते हैं इसे
कि ये तो होता ही है ,
पर यदि प्रेम है तो ये होना क्यों साथी
कभी सोचा है
कभी सोचा है हमारे और अपने बदलाव का अनुपात
प्रेम में
तुम्हारा मानना तर्क और हमारा बहस
तुम्हारे प्रतिबन्ध प्रेम और हमारे केवल शक ?
तुम्हारा श्रेष्ठ होना स्वाभाविक और हमारा आघात
तुम्हारा कहना मान्य और हमारा कहना जिद्द ?
साथी
मत बदलना तुम तब तक
जब तक हम स्त्रियाँ प्रेम का मापदंड नहीं बदलती
खुद को काबिल नहीं समझतीं
कि प्रेम साझे अनुपात में होता है
स्वीकार्य अस्वीकार्य का दर्शन समभाव होना चाहिये
एक होना चाहिए व्यवहार की परम्परा भी
कम या अधिक में नहीं
कि इसमें तो सिर्फ गुलामी होती है
मालिक की दास द्वारा ,
जल्द ही बदलना होगा पर
ऐसा लगता है
तुम्हें और तुम्हारे तथाकथित सखा भाव को भी साथी !!

Thursday, 23 November 2017

प्रेम

पलकें हौले से कांपी थी उसकी ....नमी से आँखें भर जो आई थीं कि जो समाता नहीं है वो बिखर जाता है चाहे आंसू हो या प्रेम ....ये जरूर  है कि आंसुओं का बिखरना दिख जाता  है पर प्रेम का बिखरना बस महसूस होता है ...आंसू सामने वाले पर असर छोड़ता है पर प्रेम अन्दर ही अन्दर छीलता रहता है खुद को  .... तोड़ता रहता है ...भर देता है घुटन से ...घुटन जो जीने नहीं देती ...मरने भी तो नहीं देती ...बस उम्मीद सी पलती रहती है सीने में ..आँखों में ..किसी एक पल के सुकून की ज़मीन सी या फिर कुछ रूहानी राहत की तस्कीन सी कि जब नसों में पडी गांठें धीरे-धीरे खुलने लगेंगी और लहू बेबाकी से  ह्रदय में अठखेलियाँ कर सकेगा ...

ऐसा ही कुछ था पूजा के साथ कि वो जिन्दा तो थी पर जिन्दा नहीं थी ...कि वो शामिल तो थी जिन्दगी में पर खोयी हुयी सी ...उसके अन्दर  भी कहीं कुछ टूटा हुआ था ..गहरे ..बहुत गहरे ...कभी कभी कुछ सुर्ख सा झलक आता जो उसकी सियाहियों से तो सवालिया नज़रें तन जातीं पर फिर वैसे ही मिट भी जातीं कि उसे जो भी देखता पुरसुकून पाता ....खुशमिजाज़ पाता ........ जहन में शक के लिए कोई वजह नहीं बचती क्योंकि उसके अंतस का दुःख उसके लहू में बेशक टूटता-फूटता रहे पर उसे वो कभी ज़ाहिर नहीं करती....संभाले रखती ...सेती रहती किसी खजाने सा कि जो उसका था ...केवल उसका अपना निजी ...

प्रेम यूँ ही तो खास नहीं हुआ करता न ..... इसमे जिंदगियों को कैद करने या शासित करने का स्वाभाविक गुण होता है ....कि इसकी थरथराहट अमृत भर देती है और इसकी उदासी ....वो तो धीमे जहर की तरह जिन्दगी की मुस्कुराहटों को निगल जाती है

पूजा की जिन्दगी में भी यही मसला था कि उसे प्रेम हुआ था ...बेहद प्रेम ...गहरा प्रेम ....रूहानी प्रेम ....पर वो उसे हासिल न हो सका ...और फिर एक निश्चित उदासी का अनिश्चित दौर उस पर छा गया ...दिन भर सबके सामने ..सबके साथ वो सहज होती सरल होती ...जिंदादिल होती पर तन्हाई में उसके अन्दर का एक शख्स उसके पहलू में होता जिसे वो सांस-सांस महसूस करना चाहती ....जिसकी हरारत से वो भर जाना चाहती कि जिसके कम्पनो से वो पिघल जाना चाहती ...पर वो सिर्फ कल्पनाओं का आईना भर बनकर ठहर जाता  जिसमे अक्स तो नज़र आ सकता है पर स्पर्श नहीं होता ......और इसी स्पर्श की अनुपस्थिति उसे कुंठित करती ...करती रहती लगातार और उसके सीने का पत्थर हर बार कुछ और भारी हो जाता ...होता रहता निरंतर ..

जब वो मिला था तब भी पूरा नहीं  मिला था ...और जब वो गया तब भी पूरा नहीं जा पाया ...रह गया थोडा या शायद बहुत ....उससे भी कहीं ज्यादा कि जब वो हासिल था क्योंकि अगर प्रेम कि किस्में होती हैं तो ये एक ख़ास किस्म का प्रेम था जिसमे शब्दों की अदला-बदली उँगलियों पर गिनी जा सकती थी ...कि जिसमे पत्रों की संख्या शून्य थी  ( उस दौर में मोबाइल ,इन्टरनेट या whatsapp जैसी तकनीकी सुविधाएँ मौजूद नहीं थीं ) ...बस एक फ़ोन हुआ करता था कमबख्त जो सबकी नज़रों की जद में होता और इसी वजह से उससे बात करना मुमकिन नहीं हो पाया कभी ...वैसे हिम्मत भी  नहीं हुयी कभी ...कि आवाज़ सुन पाने की कल्पना से ही जिस्म कंपकंपाने लगता ..हलक सूख जाता और उंगलियाँ गलत नंबर पर टिक जातीं ...पर हाँ ..निगाहों से जितनी बातें की जा सकनी मुमकिन थीं वो सब हुयी थीं ...कसमे-वादे ,शिकायतें इज़हार रूठना मनाना ख़ुशी आंसू बेचैनी ख्वाहिश ....इन सबको बांटा गया था ..और इसी अधूरी थाती को बूँद बूँद पीकर उसने लहू में घोल दिया है कि जिससे उसकी हर धड़कन तपती रहे ...तडपती रहे ...कसकती रहे ..रोती  रहे ....सिसकती रहे ...कि उसकी प्रीत उसमे पलती रहे .

प्रेम यूँ भी होता है ....प्रेम यूँ ही होता है ..कि जब उसे प्रेम कहा जाता है ...कहा जा सकता है कि जिसे रूहों से बांधकर माथे पर सज़ा लिया जाता है .

Friday, 8 April 2016

निःशब्द

चाँद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था 
हाँ तुम बिलकुल वैसी हो जैसा मैंने सोचा था

इसे सुनते ही कुछ लिखते-लिखते उंगलियाँ कंपकंपा उठीं....स्याही की एक लकीर फ़ैल गयी कागज़ पर बेतरतीब यूँ ही  ...सिहर उठा मन के भीतर का एक और मन  मानो अरसे से दबाये रखने की पूरी कोशिशों के बाद भी ज़ख्म जिंदा रह गए थे कहीं न कहीं ...आज अरसे बाद टीस महसूस हुयी थी और अरसे बाद ही उन ज़ख्मों की सजगता भी महसूस हुयी थी ...मन विचलित हो उठा था और यूँ लगा था कि क्यों अक्सर हमारे साथ जिन्दगी में वही होता है जिसका हम सामना नहीं करना चाहते पर दरअसल जितना हम नहीं चाहते हैं उससे ज्यादा कहीं हमारे अन्दर उम्मीद बनी रहती है कि काश ....काश अगर ये हो जाता ....और यही काश हमें जिन्दा रक्खे रहता है ...हममें सांस भरता रहता है ....

यूँ एक दौर में जब इस गाने को पहली बार सुना था ...अपने यहाँ नहीं बल्कि सामने वाले घर में तो लगा था कि कुछ ख़ास है  इसमें  यानि इस गाने में और इसको सुनने वाले में भी .....सुनने वाले  को मै तब तक थोडा जानने लगी थी ... न ..ये कहना गलत होगा ....मै तो बस उसे पहचानने लगी थी ...क्योंकि वो वहीँ मेरे सामने वाले घर में जो रहता था ...हम एक ही क्लास में थे ...स्ट्रीम अलग थे पर college एक ही था ...बेशक मैंने बात नहीं की थी कभी ...पर ये भी सच है कि पहली ही बार जब उसे देखा तो  कुछ हो गया था ...मेरे अन्दर कुछ बदल गया था या यूँ कहूँ कि कुछ नया नया सा जनम रहा था ...मेरे अहसासों में अंगडाइयां पनप रही थीं .....उस दौर का कोई लम्हा ऐसा नहीं होगा जब उसे मैंने अपनी धडकनों में महसूस  न किया हो ... उसके साथ की ख्वाहिश न की हो ...यहाँ तक कि मेरे घर की कोई  ऐसी संभावित जगह नहीं बची थी जहां से मैंने उसे अपलक देर तक निहारा न हो .........कई बार तो मम्मी की डांट खाने तक ( कमरे का दरवाज़ा बंद जो कर लेती थी )....

उसी दौरान एक रोज़ जब सर्दियाँ बस शुरू ही हुयी थीं और धूप में कुछ गुनागुनापन अब तक मौजूद था मै अपनी दोस्त के घर से लौट रही थी ..वो कुछ दूर तक मेरे साथ आई फिर अचानक ही मुस्कुराते हुए ठिठक गयी ....मैंने पूछा क्या हुआ ...उसने शरारतन इशारे से पलकें हिलायीं और फिर जो मैंने देखा वो मुझे कंपकंपाने के लिए पर्याप्त था ...चंद कदम की दूरी पर ही उसका घर था और वो गेट पर कुहनियाँ टिकाये हमारी ...न ...सिर्फ मेरी ओर देख रहा था ..निर्निमेष ...मेरी धडकने तो उस एक पल यूँ लगा कि मेरी मुट्ठियों में आ गयी हों ...जिस्म ठंडा हो गया था और होंठ बेतरह सूखने लगे थे ...ये कमाल बस उस एक पल कि नज़रों के टकराने का था या फिर उस कमसिन उम्र का या उस  अहसास का जो मै उसके लिए महसूस करती थी ...शायद वो भी ( ऐसा मुझे उस वक्त लगता था ....बल्कि मै तो निश्चित भी थी कि उसे ऐसा लगता ही था .....अब पता नहीं ये  सच था या नहीं ...क्योंकि कभी भी इसे परखने व् जानने की कोशिश न मैंने की थी  न उसने ). वो उम्र ही शायद सपनीली और ख्वाहिशों में डूबी हुयी होती है जब धड़कने पंखों पर सवार बेहिचक आवारगी करती हैं और जिसका अहसास मीठे नशे सा होता है कि जिसको जांचने की कभी जरूरत तक महसूस नहीं होती और यही आत्मविश्वास की अति कभी-कभी किसी के लिए उम्र भर का नासूर बन जाती है ..पर  उस वक्त  ये समझने की उम्र नहीं थी मेरी ...मै तो बस पंखों पर सवार कभी यहाँ तो कभी वहां उन्मुक्त  विचर रही थी ...

ऐसी ही सर्दियों की एक रात तकरीबन ११ बजे के आस-पास जब मै अपने बाहर वाले बरांडे में यूँ ही टहलती हुयी आई तो चौंक गयी ...क्योंकि जो देखा था वो  अप्रत्याशित तो था ही बेहद  सुखद भी था ...मेंरे ठीक सामने बस एक सड़क और 2 गेटों की दूरी पर वो अपने बरांडे के बाहर खड़ा था .... ...बिना किसी गर्म कपडे के जबकि ठण्ड उस वक्त तक अच्छी खासी पड़नी शुरू हो गयी थी ......और वो सिर्फ सफ़ेद t-shirt और नीली trouser में था ...उसे देख कर लगा कि वो काफी देर से वहां खड़ा था एकटक मेरे बरांडे की तरफ देखता हुआ ....  जबकि मेरे इस तरह, इस वक्त  वहां आने की कोई सम्भावना नहीं थी ..मै तो बस अचानक ही आ गयी थी .....पता नहीं क्यों .....उसकी आँखों में मुझे एक जिद्द , मासूमियत और ढेरों कामनाएं नज़र आयीं...उसकी आँखें उस वक्त  लाल लग रही थीं और पनीली भी कि उनको देखकर मन हर आया ...हसरतों में तूफ़ान उठा और बेईख्तियारी में आँखें भर आयीं ..बहुत रोने का मन हुआ ...रोई भी कि आंसू बहते रहे ख़ामोशी से और हम टकटकी बांधे एक दुसरे को देखते रहे.....एक दुसरे में डूबते रहे ....खोते रहे  ....पता नहीं कब तक ...बावजूद इसके कि अगले दिन हम दोनों के ही exams थे ......

फिर एक रोज़ उस बरस की होली आई .....उफ़ ..क़यामत का दिन था वो ....उस दिन उसका एक इकलौता चिर आकांक्षित चिर प्रतीक्षित स्पर्श मेरे हिस्से में आया था जो  अब भी ....इतने वर्षों बाद भी वैसे ही ताज़ा और सुरक्षित है मेरी यादों में और मेरे दर्द में भी कि जब तब वो  मेरे आंसुओं का बायस बन जाता  है ...जब तब मेरी तकलीफ को कुरेद देता है और मै घंटों-घंटों  गुम हो जाती हूँ उसी अहसास में भीगते --सिसकते ...दरअसल हुआ यूँ था कि हम सभी अपने - अपने ग्रुप के साथ होली खेल रहे थे ...कॉलोनी थी तो बाहर वालों का कोई डर भी नहीं था ...हुडदंग तो होता था पर अश्लीलता और छिछोरापन नहीं होता था ....ऐसे ही खेलते और सामने वाली सड़क से गुजरते हुए हम दोनों अचानक ही दोस्तों के साथ एक दुसरे के आमने -सामने आ गए ...वो एक पल को तो ठिठका पर अगले ही पल पॉकेट में हाथ डालकर मुट्ठी में ढेरों लाल गुलाल भरकर मेरे चेहरे को रंग दिया ...मै बेतरह सिहर उठी थी तब  ...मेरा देह मन आत्मा सब ....लगा जैसे कोई अबूझा अजाना सा ज्वार मुझे कहीं  बहाए ले जा रहा है और मै उँगलियाँ तक हिलाने की ताकत खो बैठी हूँ  .....मै स्तब्ध हो गयी थी कि तभी  मेरी दोस्त ने मुझे टहोका और देखकर मुस्कुरायी ....मैंने जैसे तैसे उसे बस रंग भर स्पर्श ही किया कि इतने में ही जान हलक तक  आ गयी थी ...वो लगातार मेरी तरफ देख रहा था ....पता नहीं क्या था उन नज़रों में कि मै उसके इस देखने और इस तरह से देखने को  संभाल नहीं पाई  और बेसाख्ता दौड़ पड़ी अपने घर की ओर जो बस कुछ कदमों  के फासले पर ही था ...मेरी दोस्त ने बताया कि मेरे गेट के अन्दर आ जाने तक वो पलटकर मुझे देखता रहा था और थोड़ी ही देर के बाद वो भी अनमना सा होकर अपने घर चला गया था .

क्या था ये ...क्यों था ये जो हम दोनों ही महसूस कर तो रहे थे पर शायद समझ नहीं पा रहे थे  इसीलिए कह भी नहीं पा रहे थे ....यही बात शायद उसे भी परेशां कर रही थी मेरी तरह क्योंकि कई दफे वो भी बड़ा  उलझा-उलझा दिखता था और बड़ी उलझन से मुझे देखता था पर हाँ ..उसने कभी भी नज़रें झुकाई नहीं और न ही कभी मुझसे पहले नज़रें हटायीं ...जब भी देखता तो उसकी तेज़ तर्रार शफ्फाक नज़र सीधा दिल पर असर करती और मै हर बार बस कांपकर और सहमकर रह जाती ...पता नहीं क्या था उन निगाहों में कि मै एक आश्वस्ति महसूस करती ...एक सुकून महसूस करती ...ढेरों अनजानी अनकही बेचैनियों के बावजूद भी ...


पर ये क्या ...कुछ रोज़ से वो चुपचाप सा रहने लगा था ( जबकि हमेशा ही वो बेहद बिंदास होता था ) जब भी मेरी तरफ देखता कुछ खोया-खोया सा  लगता ......यूँ लगता कि जैसे उसका कहीं कुछ छूट रहा है ....कई बार यूँ लगा कि शायद वो कुछ कहना चाहता है पर कह नहीं पा रहा ...या फिर शायद ये मेरा  भ्रम ही है ...मै भी क्या-क्या सोचती रहती हूँ ... यही सोचकर मै हर बार बात को टालती रही पर तकरीबन १० दिन के बाद ही उसमे अचानक आये इस परिवर्तन का रहस्य सामने आया .....और जो आया वो मुझे स्तंभित करने और पीड़ा से भर देने के लिए काफी था ...... मेरी खुशियों  ,कल्पनाओं  ,उम्मीदों सब पर उदासियों की झीनी चादर चढ़ने जा रही थी तमाम उम्र के लिए ....वो जा रहा था.... वो जिसके लिए मन में बेहद कोमल और नशीले अहसास थे ....वो जो मेरे मन में उमंगें जगाता था ....वो जो मेरे सपनों को पंख देता था ...वो जो मेरी हर तकलीफ में राहत का सबब था...वो जा रहा था . ... जा रहा था हमेशा के लिए शायद क्योंकि उसका पूरा परिवार भी जा रहा था और इसका मतलब ये था कि उससे भविष्य में मिलना तो दूर शायद उसे देखना भी मुमकिन न हो ...इस सच के भान के साथ ही ऐसा लगा जैसे कोई सीने से खींचकर जान  निकाल रहा है और मुट्ठियों में भींच रहा है  ........गहरी पीड़ा से अंतर्मन भर गया...कहीं कुछ दरकने लगा था भीतर  ...वैसे  इस पीड़ा को हर वो व्यक्ति महसूस कर सकता है जिसका पहला अहसास अधूरा रह गया हो ...वजह चाहे कुछ भी हो पर ये अधूरे रह गए अहसास ही कई बार हमारी जिंदगियों की आतंरिक दिशा तय कर देते हैं कि  जिसकी धार पकड़ कर जीना पहले हमारी मजबूरी ,फिर आदत और अंत में नियति बन जाती है ...कई बार ये तकलीफदेह होते हुए भी सुखद महसूस होता है क्योंकि हमें आदतन प्रेम पीडाएं अच्छी लगने लगती हैं और हम उसी में खोये रहकर खुद को तलाश करते रहते हैं ...खैर   .... ..मेरी दोस्त कुछ भ्रमित भी थी और कुछ शर्मिंदा भी क्योंकि उसको भी इस बात का पता नहीं चला था जबकि उसका भाई और वो दोनों साथ ही क्लब जाते थे ( शायद उसके भाइ ने इसे बताना जरूरी न समझा हो )....वो शायद कुछ अपराधबोध महसूस कर रही थी इसीलिए लगातार मेरी ठंडी हथेली को अपनी मुट्ठी में पकड़ी रही ....इधर सामान ट्रकों में भरा जा रहा था ...कुछ मिलने -जुलने वाले हितैषी वहां आ चुके थे .......मै अन्दर ही थी कि तभी मम्मी ने कहा कि बेटा , आंटी बुला रही हैं ...जाओ मिल लो ...और मै जैसे कुछ सोच समझ ही नहीं पा रही थी ...दिमाग सुन्न हो गया था ...फिर भी मेरी दोस्त के साथ मै गयी ...विदाई के कुछ शब्द कहे गए दोनों तरफ से ...वो फिर अपने दोस्तों के साथ दूर खडा सिर्फ मुझे देख रहा था ...जलती आँखों से जो लग रहा था जल्दी ही पिघल जाने वाली हैं  .... अब मुझे आश्चर्य होता है अपने उस दिन के धैर्य पर कि मै किस तरह से मुस्कुरा कर सबसे मिली और फिर बस एक ठहरी हुयी सी नज़र उसपर डालकर चुपचाप घर वापस आ गयी ....दुबारा मैंने पलट कर नहीं देखा ...मै चुपचाप बिस्तर पर लेट गयी ...मेरी दोस्त शायद मेरी मनोदशा समझ रही थी ...वो कुछ देर तक मेरे पास बैठी रही फिर अपने घर चली गयी ...यकीन मानिए उस दिन एक कतरा आंसू भी मेरी आँखों से नहीं बहा .... बस सिर बहुत तेज़ दुखने लगा था और दुखता रहा था  कई दिनों तक ...और कई दिनों तक मै वाकई नहीं रोई पर कुछ दिनों अचानक ही जो बाँध टूटा तो मै रोई ...खूब रोई ....अपने दोस्त के गले लगकर रोई ...उसकी हथेलियों में रोई ...तकिये पर सिर रखकर रोई ....रोती रही बस ...इतना कि एक दिन आंसू सूख गए ...और रह गयीं बस पीडाएं ...अपने पूरे अधिकार ...पूरी गरिमा के साथ ....

कभी कभी मैंने ये भी सोचा कि क्यों .....आखिर क्यों ये दुःख ....क्यों ये पीड़ा ...उसने कहा तो था नहीं कुछ मुझे कभी भी ....कोई वादा नहीं किया था ...कोई कसम नहीं खाई थी ...फिर आखिर क्या था कि जिसके नहीं रहने पर इतना घनघोर दुःख .....इतनी घनी पीड़ा 

पर नहीं ...था ...सब कुछ था ...उसने कहा था ...कई बार कहा था .... कि जब जब भी वो प्रेम से मेरी तरफ देखता था ....तब तब  उसने कहा था कि उसे मुझसे प्रेम है  ... उसने वादे भी किये थे और कसमे भी खाई थीं कि जब वो रात के अँधेरे में लैंप पोस्ट की रौशनी में अपने बरांडे के बाहर सिर्फ मुझे देखने के लिए इंतज़ार किया करता था और पहरों मेरी निगाहों में घुलता रहता था तब तब उसने वादों और कसमों की सौगात दी थी  मुझे और जब उसने मेरे चेहरे को अचानक ही लाल रंग से भर दिया था ...मुझे स्पर्श किया था उसी पल  उसने मेरी देह और मेरी आत्मा दोनों को छू  लिया था और इसके साथ ही ताउम्र साथ  का वचन भी दिया था ..फिर उसने इसे निभाया क्यों नहीं ....क्यों ....आखिर क्यों .....


पर कहते हैं न कि ये जिन्दगी है और इसमें ढेरों काश और अनगिनत क्यों भरे पड़े हैं ....हम सब अपने आप में अपनी उम्मीदों और अपनी पीडाओं से लड़ रहे हैं ....अंततः हारकर स्वीकार कर लेते हैं इसकी कडवाहट और तकलीफों को ...कभी कभी बदल देते हैं इसे आदतों में और खुश रहने का दिखावा करते रहते हैं ...और जो नहीं कर पाते हैं वो हरियाते रहते हैं कैक्टस से और एक दिन अपनी ही आगोश में गुम हो जाते हैं !!

अनकही ....निःशब्द प्रेम कहानियों का अक्सर यही अंजाम होता है

कि मेरी रूह में तकलीफ के मोती जड़ें हैं 
कि मेरा आइना मुझको हंसीं बताता है !!