Monday, 27 November 2017

यूँ ही

जब हम बीमार हों
हमारे आस पास की हवा हो अलसाई
जब उबी हुई सी महक आये
जीभ लगे कसैली
उकताहट भरे हों दिन और धूप
और रात खूब लंबी ,
क्या करें फिर
सिवाय इसके
कि सिर तक तानकर चादर
सोते रहें
कुढते रहें.।

भावचित्र

ये उस दौर का एक भावचित्र
जब धरती हुआ करती रही
आग का एक विशाल गोला
तपती ,दहकती , निर्लिप्त ,एकाकी ,
और जब बारिश पहली बार छलकी होगी
फिर और छलकी होगी
फिर बरसी होगी बेहिसाब
टूट पड़े होंगे रेले
और छन्न से गूंजा होगा संगीत
सरगम का पहला सुर
पहली धुन
और फिर बजता ही चला गया होगा
उन्मत्त बूंदों के सतरंगी प्रवाह में
नाच उठा होगा मन मयूर
आत्मा तृप्त हो प्रमुदित हुयी होगी
जग बौराया होगा
गगन मुस्काया होगा
अहा ....अद्भुत ....
आंख मीचे मुदित मगन हो करें कल्पना !!

बहने

बहनें जरूरी होती हैं
लड़ने झगड़ने शिकवे शिकायतों 
रूठने मनाने व् फिर लड़ने के लिए
सब्र आजमाने बेफुजूल सुनाने
कुछ लम्हें उनके चुराने कुछ अपने बनाने के लिए
बहनें जरूरी होती हैं ,
मन का भेद कहने
थोडा उनके हिस्से को बांटने अपनी बंटाने
दुःख सुख साझा करने
हौसलों को थामे रखने
किसी से कहीं भी कभी भी लड़ भिड जाने के लिए
बहनें जरूरी होती हैं ,
बहनें जरूरी होती हैं
कि बहनें रूह का आधा हिस्सा होती हैं
बचपन का पूरा किस्सा होती हैं
रात के अँधेरे में करती चुहलबाजियाँ
सहेलियों में बघारी शेखियां होती हैं
फिर आम का अचार चटपटा सा प्यार
बूंदी का गर्म लड्डू और चोरी का समोसा होती हैं ,
हो कोई भी त्यौहार या फिर हो रविवार
वो साथ का खज़ाना
यौवन का हर अफसाना
एक थाली का खाना संग गुनगुनाना
बोरसी की आग बेसुरा सा राग
कच्चा अमरुद खट्टी सी इमली या बडका तालाब
रजाई की गर्मी बिस्तर का आधा साइड
दिल से थोड़ी वाइड
पापा की दुलारी मम्मी की रानी बिटिया
मेरे जलन की पुडिया होती है ,
पर पराई इस दुनिया में जो सबकुछ अपना बना दे
मन को सज़ा दे
जो खूबसूरत तसल्ली सी लगे
अजनबी लोगों में अपनी सी लगे
वो कस्तूरी होती हैं
बहने जरूरी होती हैं !!

हो सकता है

राख से रचा फूल
आग में पकी कविता
हो सकती है ,
हो सकता है 
दूध का चन्द्रमा बनना
और सूरज का होना रेत ,
पहाड़ का मिटटी बनना भी मुश्किल नहीं
न ही नदी का सूखकर कुछ जगह उधार देना
अगर बोना हो उसमे गुलाब
उगानी हो नज़्म ,
एक हरे आसमान की कल्पना भी नामुमकिन नहीं
महसूसनी हो गर वहां समन्दर की आत्मा
देखना हो ढेरों बत्तखों का झुण्ड ,
तितलियों को मौसम का प्रेम भी कह सकते हैं
जो बिखरा होता है उनके पंखों पर
उड़ते हुए कभी कभी छिटक भी जाता है
जैसे छिटक जाती है रोली टीका करते समय
या जैसे छिटक जाता है सिन्दूर भरते हुए कोई सूनी मांग ,
ये सब उतना ही संभव है
कि जितना संभव है
आलमारी में पड़ी पुरानी किसी डायरी का अचानक हाथ लगना
पीले पड चुके पन्नों में से किसी एक का गुलाबी हो जाना
उस पर बार बार तराशकर लिखे गए एक नाम का पिघलकर गीला हो जाना
और हो जाना नज़रों का पहले झिलमिल
और फिर क्रमशः आत्मा का बोझिल हो जाना !!

छोटी बच्ची

मै आज भी
उस दौर में हूँ
जब तितली के परों पर
खुशबुओं से नज़्म लिखा करते थे ,
जब हवाओं पर उड़े उड़े फिरा करते थे 
जब आंगन में चूल्हे होते थे
जब पेड़ों में झूले होते थे ,
जब माँ की गोद लिहाफ सी हुआ करती थी
जब कुनमुनाई सी नींद बाहों में गुजरती थी
जब सरसों के तेल तालू पर थपक थपक कर रखे जाते थे
जब अमरुद गाजर का हलवा भूनी मूंगफली
साथ बैठकर खाते थे
वो अन्ताक्षरियों का वक्त था
पो शम पा और गुड्डे गुड़ियों का वक्त था ,
मुझे फिर से उसी वक्त में बस लौट जाना है
मुझे फिर से अपनी माँ की छोटी बच्ची भर
बन जाना है |

सुनो साथी

सुनो साथी
तुम मत बदलना
कि बदलती हैं स्त्रियाँ प्रेम में 
पुरुष नहीं ,
जब तुम हमें टोकते हो बांधते हो
हम उसे प्रेम मान लेते हैं
जब तुम हमारे कपड़ों को संतुलित करते हो
हम उसे भी प्रेम मान लेते हैं ,
हमें तो वो भी प्रेम ही लगता है
जब तुम हमारा किसी से बात किया जाना बाधित करते हो
या जब तुम ये कहते हो
तुम अपनी सहेली से ज्यादा सभ्य व् सुसंस्कृत हो
तुम ज्यादा परिपक्व हो
हमारे पुराने ढर्रों को भी तुम स्वाभाविक मान लेते हो
कमतर होने को सामाजिकता ,
प्रेम तो हम स्त्रियाँ उसे भी समझ लेते हैं
जब बीमारी में तुम पानी का गिलास पकडाते हो
या पूछते हो डॉक्टर के पास चलना है ?
या जब कहते हो
ठीक लग रहा हो तो ज्यादा कुछ नहीं खिचडी ही बना लो ,
हमारे जीवन पर आदतों पर आधिकारिक नियंत्रण
सामान्य है तुम्हारे लिए
कि ये तो होता ही है
हम स्त्रियाँ भी प्रेम की खुशफहमियों का जाल ओढ़े
स्वाभाविक मान लेते हैं इसे
कि ये तो होता ही है ,
पर यदि प्रेम है तो ये होना क्यों साथी
कभी सोचा है
कभी सोचा है हमारे और अपने बदलाव का अनुपात
प्रेम में
तुम्हारा मानना तर्क और हमारा बहस
तुम्हारे प्रतिबन्ध प्रेम और हमारे केवल शक ?
तुम्हारा श्रेष्ठ होना स्वाभाविक और हमारा आघात
तुम्हारा कहना मान्य और हमारा कहना जिद्द ?
साथी
मत बदलना तुम तब तक
जब तक हम स्त्रियाँ प्रेम का मापदंड नहीं बदलती
खुद को काबिल नहीं समझतीं
कि प्रेम साझे अनुपात में होता है
स्वीकार्य अस्वीकार्य का दर्शन समभाव होना चाहिये
एक होना चाहिए व्यवहार की परम्परा भी
कम या अधिक में नहीं
कि इसमें तो सिर्फ गुलामी होती है
मालिक की दास द्वारा ,
जल्द ही बदलना होगा पर
ऐसा लगता है
तुम्हें और तुम्हारे तथाकथित सखा भाव को भी साथी !!

Thursday, 23 November 2017

प्रेम

पलकें हौले से कांपी थी उसकी ....नमी से आँखें भर जो आई थीं कि जो समाता नहीं है वो बिखर जाता है चाहे आंसू हो या प्रेम ....ये जरूर  है कि आंसुओं का बिखरना दिख जाता  है पर प्रेम का बिखरना बस महसूस होता है ...आंसू सामने वाले पर असर छोड़ता है पर प्रेम अन्दर ही अन्दर छीलता रहता है खुद को  .... तोड़ता रहता है ...भर देता है घुटन से ...घुटन जो जीने नहीं देती ...मरने भी तो नहीं देती ...बस उम्मीद सी पलती रहती है सीने में ..आँखों में ..किसी एक पल के सुकून की ज़मीन सी या फिर कुछ रूहानी राहत की तस्कीन सी कि जब नसों में पडी गांठें धीरे-धीरे खुलने लगेंगी और लहू बेबाकी से  ह्रदय में अठखेलियाँ कर सकेगा ...

ऐसा ही कुछ था पूजा के साथ कि वो जिन्दा तो थी पर जिन्दा नहीं थी ...कि वो शामिल तो थी जिन्दगी में पर खोयी हुयी सी ...उसके अन्दर  भी कहीं कुछ टूटा हुआ था ..गहरे ..बहुत गहरे ...कभी कभी कुछ सुर्ख सा झलक आता जो उसकी सियाहियों से तो सवालिया नज़रें तन जातीं पर फिर वैसे ही मिट भी जातीं कि उसे जो भी देखता पुरसुकून पाता ....खुशमिजाज़ पाता ........ जहन में शक के लिए कोई वजह नहीं बचती क्योंकि उसके अंतस का दुःख उसके लहू में बेशक टूटता-फूटता रहे पर उसे वो कभी ज़ाहिर नहीं करती....संभाले रखती ...सेती रहती किसी खजाने सा कि जो उसका था ...केवल उसका अपना निजी ...

प्रेम यूँ ही तो खास नहीं हुआ करता न ..... इसमे जिंदगियों को कैद करने या शासित करने का स्वाभाविक गुण होता है ....कि इसकी थरथराहट अमृत भर देती है और इसकी उदासी ....वो तो धीमे जहर की तरह जिन्दगी की मुस्कुराहटों को निगल जाती है

पूजा की जिन्दगी में भी यही मसला था कि उसे प्रेम हुआ था ...बेहद प्रेम ...गहरा प्रेम ....रूहानी प्रेम ....पर वो उसे हासिल न हो सका ...और फिर एक निश्चित उदासी का अनिश्चित दौर उस पर छा गया ...दिन भर सबके सामने ..सबके साथ वो सहज होती सरल होती ...जिंदादिल होती पर तन्हाई में उसके अन्दर का एक शख्स उसके पहलू में होता जिसे वो सांस-सांस महसूस करना चाहती ....जिसकी हरारत से वो भर जाना चाहती कि जिसके कम्पनो से वो पिघल जाना चाहती ...पर वो सिर्फ कल्पनाओं का आईना भर बनकर ठहर जाता  जिसमे अक्स तो नज़र आ सकता है पर स्पर्श नहीं होता ......और इसी स्पर्श की अनुपस्थिति उसे कुंठित करती ...करती रहती लगातार और उसके सीने का पत्थर हर बार कुछ और भारी हो जाता ...होता रहता निरंतर ..

जब वो मिला था तब भी पूरा नहीं  मिला था ...और जब वो गया तब भी पूरा नहीं जा पाया ...रह गया थोडा या शायद बहुत ....उससे भी कहीं ज्यादा कि जब वो हासिल था क्योंकि अगर प्रेम कि किस्में होती हैं तो ये एक ख़ास किस्म का प्रेम था जिसमे शब्दों की अदला-बदली उँगलियों पर गिनी जा सकती थी ...कि जिसमे पत्रों की संख्या शून्य थी  ( उस दौर में मोबाइल ,इन्टरनेट या whatsapp जैसी तकनीकी सुविधाएँ मौजूद नहीं थीं ) ...बस एक फ़ोन हुआ करता था कमबख्त जो सबकी नज़रों की जद में होता और इसी वजह से उससे बात करना मुमकिन नहीं हो पाया कभी ...वैसे हिम्मत भी  नहीं हुयी कभी ...कि आवाज़ सुन पाने की कल्पना से ही जिस्म कंपकंपाने लगता ..हलक सूख जाता और उंगलियाँ गलत नंबर पर टिक जातीं ...पर हाँ ..निगाहों से जितनी बातें की जा सकनी मुमकिन थीं वो सब हुयी थीं ...कसमे-वादे ,शिकायतें इज़हार रूठना मनाना ख़ुशी आंसू बेचैनी ख्वाहिश ....इन सबको बांटा गया था ..और इसी अधूरी थाती को बूँद बूँद पीकर उसने लहू में घोल दिया है कि जिससे उसकी हर धड़कन तपती रहे ...तडपती रहे ...कसकती रहे ..रोती  रहे ....सिसकती रहे ...कि उसकी प्रीत उसमे पलती रहे .

प्रेम यूँ भी होता है ....प्रेम यूँ ही होता है ..कि जब उसे प्रेम कहा जाता है ...कहा जा सकता है कि जिसे रूहों से बांधकर माथे पर सज़ा लिया जाता है .