Saturday, 9 December 2017

मुमकिन

मुमकिन है
कुछ सालों बाद तुम समझ पाओ
कि रेशम भी छीजता है
नदी भी टूटती है
और बदरंग होती है हल्दी की गाँठ भी ,
अगरबत्तियां झड जाती हैं
कुरेद कर लिखे नामो में सीलन भर जाती है
काली हो जाती हैं सुंदर आँखें
उँगलियाँ सख्त हो जाती हैं
मुमकिन है
तुम कहो उसे वक्त की बदमिजाजी
कहो चश्मे को बदला हुआ
या समझ की तस्वीर को धुंधला कहो ,
ये सब कहा जाना बेकार है मेरे हमनफ़ज़
कि टूटने के बाद आइना खुद का नहीं होता
कि टूटने के बाद बेशक चेहरे भी कई हो जाते हैं
पर भूलना मत कि वो तकसीम भी हो जाते हैं ,
भुलावों पर प्रेम नहीं टिकता
तुम चाहो तब पर भी नहीं |

यादें

ओसारे की खटिया
पुरानी रजाई , रजाई में तुम
तुम्हारी ही छाती में दुबकी हुयी सी चिपटी सी मै
जैसे बिल्ली हो भूरी ,
गले जब भी देह ठंडक से सुर सुर
तुम्हारा वो ताप मद्धिम सा लगता ओढा देता फिर
मुझे नींद अपनी
बाहों का तकिया हथेली की नरमी
माथे पर चुम्बन सज़ा देतीं तुम
कि जैसे मै कोई थी राजकुमारी
ऐसी वो लज्ज़त थी गाँवों के ठंडक की
ऐसी ठनक थी कि जब तुम थीं सच की ,
कहाँ हो तुम अब
कहो न
कि गाँवों में जाना मटर कच्ची खाना
लाइ का लड्डू
गरम गुड का चखना छोड़ दिया है
पुआलों में छुपना कच्ची नींद सोना
गरम दूध पीना
नमक लहसुन वाला अमरूदों के संग
खाना खिलाना भी छोड़ दिया है
कि छोड़ दिया है गरम गरम चावल में गड्ढे बनाना
चटकारी सब्जी फिर उसमे मिलाना
फूंक फूंक खाना ,
नहीं करता दिल कि बोरसी के आगे हथेली फैलाऊं
गाल छुआऊँ
मुलायम सी दहक से किलक किलक जाऊं
नारंगी चमक होठों पर सजाऊं
ये भी नहीं कि भरी दोपहरी सबको छकाऊँ
अदरक वाली चाय पियूं पिलाऊं ,
नहीं करता दिल ये करने को अब कुछ
मेड़ों के रस्ते भटकने को अब कुछ
कि अब तो ये ठंडक भी वैसी नहीं है
पीली सी धूप शैतानी करती रगों में बहकती
जैसी नहीं है
जैसी थी पहले
कि जब साथ तुम थीं ,
तुम अब नहीं हो तो गाँवों में जाना भी छूट गया है
शायद वो रिश्ता इनारे के जैसा अब टूट गया है ||

प्रश्न

समझ नहीं पाई
ये गुस्सा तुम्हें ही क्यों आता है
मुझे क्यों नहीं आता ,
घनघोर किस्म के गुस्से में भी 
बस मुट्ठियाँ ही कसीं
कहर कभी नहीं हुयीं मेरी आँखें
कभी फेंक नहीं पायी मै खाने की थाली
कभी ग्लास या कप नहीं तोडा
कभी नहीं फेंकी तड़ाक से कोई भी घडी
या मोबाइल
कभी दरवाज़ा नहीं पटका
गालियाँ भी नहीं दीं
पता नहीं क्यों ,
शायद मेरा गुस्सा संस्कारी है
आपे से बाहर नहीं जाता
बस अन्दर से खुद को कडा कर देता है
जैसे कडा कर देता है ज्वालामुखी का असीमित ज्वार
काली सुन्दर चट्टानों को
कुछ रुखा कुछ कड़वा भी
मुझे चुप कर देता है
और तुमसे मेरी आत्मा को कुछ और दूर ,
ये ख़ामोशी मुझे डराती है
इसलिए नहीं
कि मै क्रोध संयमित करने में भी अग्नि का इस्तेमाल करती हूँ
इसलिए
कि एक दिन कहीं यही अग्नि तुम्हारे लिए अग्निकुंड न साबित हो
साथी |

डर

मुस्लिम प्रेमी की
हिंदू प्रेमिका हूँ मै
मुझे लगता है हमें मार दिया जाएगा
कि अब धर्म हमारे उसूलों में नहीं
हमारे फायदों में रहता है 
हमारे किरदार में नहीं
हमारे कायदों में रहता है ,
प्रेम होना रूहों का नहीं धर्म का मसला है अब
जीने का नहीं ताकत का असलहा है अब ,
कि जिसे खुशबुओं और कम्पनों से नहीं आँका जाता
रुद्राक्ष और खतनाओं से है जांचा जाता
कोई शीरीं न ही लैला न तो फरहाद है
वो बस गुडिया या फिर सलमा या तो जेहाद है
कि इश्क अब डर की सरहदों का कैदी है
कभी आग कभी कुल्हाड़ी कभी भीड़ की मुस्तैदी है ,
नोंच लेते हैं सरेआम वो जिस्म उनके
खींच देते हैं फाड़ देते हैं जो कपडे उनके
नंगी देह पर जो खुलकर मुस्कुराते हैं
हँसते खिलखिलाते जो ठहाके लगाते हैं
क्या वो इंसान हैं मुझको तो शक होता है
उनकी माओं पर बहनों पर दुःख होता है
सारी प्रार्थनाएं सारे अज़ान बेकार हैं अब
सारी दुआएं सारी मन्नतें बेजान है अब ,
इश्क अब दिल से नहीं दिमाग से करना होगा
उसकी जाति उसका गोत्र उसका धर्म भी देखना होगा
जो ऐसा न किये तो बेतरह पछताओगे
बेमकसद ही एक रोज़ तुम मार दिए जाओगे
सरकार और धर्म के पहरुओं से उम्मीद मत रखना
कभी भूलकर भी उनसे अपने दिल की कुछ मत कहना
पहले वो अपनी राजनीती अपने ऊंट की करवट देखेंगे
फिर अपने लोगों से कहकर फसादात के ज़हर छीटेंगे
लम्बी लम्बी तकरीरें लम्बे लम्बे शहादत के भाषण होंगे
काहिलों की महफ़िल कमीनगी के नजारत होंगे
मसला तुम्हारा यूँ ही बेसहारा रह जाएगा
बिना किसी न्याय के अन्याय सा हो जाएगा ,
कि ये दौर मुहब्बतों का नहीं नफरतों का है
इस दौर में बचकर रहना होगा
ज़ज्बात कितना भी मचलें सीने में
होंठ सिलकर सहना होगा ,
पर जिन्हें हो गयी है उनका क्या
अंधियारी रात के किसी कोने में
डरते सहमते आँखों में आंसू भरे
गिडगिडाती सी
वो अपनी सहेलियों के सीने से लग कह रही हैं
कि मुस्लिम प्रेमी की
हिन्दू प्रेमिका हूँ मै
मुझे लगता है हमें मार दिया जाएगा |

Tuesday, 28 November 2017

टीस

मै सोचती थी इश्क है
उसने मगर सुविधा चुनी
तर्कों को कसकर
खीझकर
फिर कह दिया मुझको अजब 
क्या गजब ,
मै अभी भी भ्रम में हूँ
कुछ गम में हूँ
क्या हूँ मै ,
संभव है वो ही सच है शायद
झूठ तो मै भी नहीं पर ,
वक्त शायद हो चला है वापसी का
चल समेटें खुद को साथी
राह देखें अपनी अपनी
नीड़ का निर्माण अब मुमकिन नहीं .

Monday, 27 November 2017

इश्क

इश्क आदत है निभाते रहिये
दर्द सरेराह यूँ बिछाते रहिये,
भर उठे जब भी आँसुओं से हलक
नगमा महफिल में सुनाते रहिये,
रख कर हाशिये पर राहतोें को
खुद में बेचैनियां जगाते रहिये,
कभी रियाज तो कभी चोटों से
दिल को शबनमी बनाते रहिये,
रात टूटी है बङी देर के बाद
जाम उसको भी पिलाते रहिये,
यकबयक सामने आ जायें कभी
उनको इस तरह बुलाते रहिये,
न हुये मेरे तो कोई बात नहीं
"राज "गैर न हों ये सिखाते रहिये।

शाम

शाम की कनी चुप है
कुछ उदास शायद
मन धूप की सफेद दरारों के बीच फंसा है,
सुुबह कह रहा था कोई बूँद भर प्यास की कहानी 
बता रहा था कि कैसे छाती भर आग में मोती छनछनाते हैं
कैसे बजता है संगीत जब बादल फटते हैं,
मिट्टी में रेत मिली है
जैसे उम्मीद में दुख
जैसे मदिरा में जल
या जैसे चाह में निराशा,
शाम जब रोशनी थी
खुश थी
शाम अब अंधेरा है
तो समझ दार है।।