Monday, 17 December 2012

हसरतें

सुनो
मुझ पर उँगलियाँ उठाने से पहले ,

अपनी शराफत मे कुछ रौशनी घोलो और नमी भी
फिर अपने हिस्से की शाइस्तगी  तुम रखो
मेरे हिस्से की सियाही मै रखती हूँ ,

जिस्म धागों मे बंधा कोई धर्मग्रंथ नहीं होता
प्रकृति को  जीना कोई त्रासदी नहीं होती
और हसरतें एक उम्र के बाद भी हसरतें ही होती हैं ,

रगों मे उगी धूप किसी साये की तलाश मे है
जिस तरह समंदर को थामना कभी मुमकिन नहीं होता
वैसे ही जिस्म छीली हुई ख़्वाहिशों की कब्रगाह नहीं होती ,

तकलीफ अब लहू मे सुलगने सी लगी है
हमनफ़ज मेरे !!!


             अर्चना राज 

Wednesday, 5 December 2012

रुदन

कुछ वक्त पहलू मे गुजारकर जो हर रोज तुम यूं ही चले जाते थे छोडकर मुझे
बिना कुछ पूछे ,बिना कुछ कहे
सोचा है कभी किस कदर सुलग उठती थी मै और क्यों ,

पर हर बार जब चूल्हे की आग से तप आए मेरे चेहरे को अपनी नज़रों से छूते थे
तो क्या समझ पाते थे की उतनी ही खामोशी से पिघल भी जाती थी मै ,

वर्षों बाद तुम्हारा कुछ मौन और कुछ स्पंदन मेरे आँचल के कोरों मे सुरक्षित है
क्योंकि तुम अब मेरी सीमाओं से परे हो ,

अब शामें दहलीज़ तक आकर सहम उठती हैं
दोपहर के बाद अचानक गाढ़ी रात ही मेरे कमरे मे पसर जाती है
मेरे कपड़ों और पावों मे भी
न जाने कैसे ,

तमाम रात सभी दीवारें बोझ से दुहरी होकर मेरे कांधे पे टिक जाती हैं
और कोई कहीं दूर बैठा बांसुरी बजा रहा होता है
रुदन से भरपूर ,

नसों मे अब छाले उभर आए हैं !!!


     अर्चना राज 

Monday, 3 December 2012

जाफरानी

जाफरानी इश्क है मेरा - तुम्हारा
यूं तो तन्हा बर्क है बेकैफ है
घुल अगर जाये तो हो अमृत सरीखा ,

दूर तक फैली चिनारों की कतारें
पूरे डल मे जैसे फैली हों बहारें
हर तरफ बस इश्क ही बिखरा हुआ है
है कुरान-ए-पाक और है इश्क गीता
इन हवाओं मे इबादत गूँजती है
हर नज़र लगती है जैसे सूफियाना ,

ख्वाब खुशबू से यहाँ बिखरे पड़े हैं
है सतह रेशम के इक कालीन जैसी
ज़र्रे-ज़र्रे पे मेरी सांसें हैं बेकल
थामने हर चाप जो गूँजेगी तुझसे ,

हैं बड़ी मासूम सी पाबन्दियाँ भी
चिलमने तहज़ीब सी हैं
दायरा दहलीज़ है
बेसबब कमबख्त ये सरहद हमारी
पार जिसके है चमन मेरा तुम्हारा ,

शाम कहवे सी कसैली हो भले ही
रात तो बस खीर सी मीठी ही होगी
 चाँद के झूले मे जब शबनम गिरेगी
हर लबों पे खिल उठेगा फिर तबस्सुम

इसलिए ही जाफरानी इश्क है ये
और रवायत भी यहाँ सदियों पुरानी !!


बर्क ----बिजली

बेकैफ ---- बेमज़ा




 अर्चना राज












Sunday, 2 December 2012

काश

पढ़ पाती जो तुम्हारा जहन तो शायद
यूं रोज़-रोज़ लावे सा मेरा अंजाम न होता ;
कैद कर लेती उस वक्त को मुट्ठी मे किसी सोते सा
जिस वक्त मे धुंध भी तुम्हारी साँसों सी महसूस होती थी ,
रोप लेती उन धडकनों को छुई-मुई के पौधों सा खुद मे
जब दिन का कोई लम्हा अचानक ही बेहद सुर्ख हो आता था
और हरारत बोझिल सी पलकों पे बिखर जाती थी ,

पढ़ पाती जो तुम्हारा जहन तो शायद
यूं न होता की हर शाम किसी शाख से टूटा कोई पत्ता होती
या हर रात मई सी जला करती मुझमे ,

पढ़ पाती तुम्हारा जहन तो यूं करती कि
सारी कायनात मे कोई दरवाजा कभी बाहर को न खुलता ;
तेरे हर कदम पर मेरा अहसास हिमालय होता
तेरी हर सांस कि दहलीज़ मेरी सांसें होतीं ;
हर सुबह मेरी मुस्कान
हर शाम मेरी ख़्वाहिश होती ,

पढ़ पाती जो तुम्हारा जहन तो शायद यूं न होता
कि मेरी उम्र हर रोज़ किसी मौत के आगोश मे पलती !!


               अर्चना राज

Thursday, 1 November 2012

वेदना

जिस्म टंका है सूरज पर
बेचैनियां भी सरहदी नहीं रहीं ,

बादलों सी ख्वाहिशें
सहरा सी किस्मत
आवारगी हवाओं की
दर्द पहाड़ों सा ,

और तुम
अब भी
बस चाँद से नज़र आते हो
हमनफ़ज मेरे !!


     अर्चना राज 

Wednesday, 17 October 2012

नशा

नशा है मूर्तियाँ गढ़ना भी
जुनून ...जिद्द ...पागलपन
बिना रक्त मांस के एक इंसानी जिस्म
बिना रीढ़ के सीधी खड़ी परिकल्पना
छेनी से उकेरी आँखों मे प्रेम की तलाश
एक निहायत बेमानी कोशिश ,

अनगढ़,अपरिचित ,अपरिपक्व शब्द गूंज उठते हैं
मूर्तियों मे जान है
बावजूद इसके की सांस नहीं है ,

ये खुद को खुदा मानने की पहल है
या फिर खुदा को आईना दिखने की हिकमत
नशा हद से गुजर जाये तो गुनाह हो जाता है
बेशक वो इबादत का ही क्यों न हो !!

            अर्चना राज

अंतर्वेदना

सदियों की सर्द रात तल्खियों सी
अब हड्डियों मे उतरने लगी है
ऐसे ही कुछ गजलें भी
बीते दिनों की उदास  चित्रकारी सी हो गयी हैं ,

स्याह तनहाई जब भी रगों मे
पैठने लगती है कहीं गहरे बहुत
न जाने कहाँ से इक सूरज जनमता है मुझमे
 और लहू मे बिखर जाता है ,

कतरा-कतरा जिस वक्त
तुम्हारे नाम की लकीरों सा होकर जल रहा होता है 
ठीक उसी वक्त न जाने कहाँ से
एक दरिया भी मेरे  जिस्म  मे बर्फ सा उतर  आता है ,

इक हस्सास तस्वीर
अक्सर बूंदों सी गिरती है मेरे माथे पर 
हौले से फिर जख्म उभरता है माजूरी का
और दर्द ग्लेशियर मे तब्दील हो जाता है
हमनफ़ज मेरे !!



               अर्चना राज

Monday, 8 October 2012

हौसला

चलो सूरज के कुछ गोले बनाएँ
रख दें उन्हें चुपके से फिर उस स्याह आँगन मे
जहां सपने अंधेरे मे खड़े हैं मुंह बिसूरे
जहां खुशियाँ फकत इक नाम भर हैं ,

कोई टोली जो गुजरी थी कभी जब जुगनुओं की
तो माँ ने यूं कहा था कसमसाकर
कि बेटा देख ये ही रौशनी है;
यही उम्मीद है ,जरिया है ,हासिल है हमे जो
बढ़ाती हौसला कि वो (खुदा ) नहीं गाफिल है हमसे
बड़ी बेबस सी थी मुस्कान तब उन आसुओं की
जगा था हौसला तब ही मेरी भी कश्मकश मे ,

भले ही हाथ मेरे जल ही जाएँ
बेतरह ये गल ही जाएँ पिघल ही जाएँ
नज़र आए भले ही ठूंठ फिर भी ,

बनाऊँगी मै सूरज को ही जरिया रौशनी का
रख दूँगी उन्हें चुपके से फिर उस स्याह आँगन मे
जहां इस रौशनी मे वो हँसेंगे -मुस्कुराएंगे
गले मिलकर हजारों खिलखिलाएंगे
पूरे करेंगे पल रहे सपने
जिएंगे वो भी फिर इंसान जैसे
मुकम्मल होंगे जब अरमान उनके ,

होना भी तभी सूरज का यूं साकार होगा
खुशियों मे भी जब उसका कहीं आभार होगा ,

चलो सूरज के कुछ गोले बनाएँ
रख दें उन्हें चुपके से फिर उस स्याह आँगन मे
जहां पगडंडियाँ मंजिल की  स्याही मे खड़ी थीं
जहां अब रौशनी मुस्कान कि हर ओर होगी !!


            अर्चना राज








Thursday, 4 October 2012

अनकहा

मौन के धरातल पर विचरते कुछ शब्द
अपनी समस्त भावनात्मक तीव्रता के साथ भी 
अनकहे ही रह जाते हैं ,

आवाज़ की तमाम कोशिशें यहाँ नाकाम नज़र आती हैं 
धूप भी थककर जब बड़ी मायूसी से 
रात की ओट मे अपनी आँखें बंद कर लेती है 
और जब इंतज़ार टूटकर जिस्म के हर गोशे मे 
पारे सा बिखर जाता है ,

इक अधूरी नज़्म का  पन्ना आंधियों  मे बेआवाज फड़फड़ाता है 
और आंसुओं की इक लकीर अनायास ही 
समंदर को चीरती चली जाती है 
अपने जख्म को मोतियों के अंजाम तक पहुंचाने के लिए 
एक पूरी उम्र की कीमत पर भी ,

मानो इंतज़ार अब भी सीपों मे पलता है आजमाइश की इंतहाँ तक 
और शब्दों को आवाज़ के लिए अब भी एक सदी की दरकार है !!



                      अर्चना राज 

Tuesday, 11 September 2012

वेश्या बनाम औरत

सीली साड़ी में हर रात कसमसाती हैं ये औरत
जिस्म से रूह तक कांप-काँप जाती हैं ये औरत
आता तो यूँ हर रोज है कोई चाँद इनकी ड्योढ़ी पे
सूरज की किरणों से मगर  खौफ खाती हैं ये औरत,

इंसानियत के उसूलों से कहीं बहुत ही दूर
ज़िंदा इंसान नहीं सिर्फ जिस्म  हैं ये औरत
चलती फिरती बदनुमा कब्रगाह सी नज़र आती
लिजलिजी हसरतों का माजूर अंजाम हैं ये औरत ,

कोई रिश्ता ,कोई बंधन कोई सपना नहीं जिनका
खालीपन की अंधी गलियों का स्याह सामान हैं ये औरत
बंद कमरों में घुटती -सिसकती ,डरी - सहमी हुई सी
चमकीले रंगीन पैरहन में भी बुझती राख सी हैं ये औरत ,

यूँ तो वेश्या हैं इंसान नहीं ..गाली हैं सम्मान नहीं
फिर भी समाज के शराफत की 
ज़िंदा मिसाल हैं ये औरत
हमारे आंगन में  तुलसी अब तक ज़िंदा है
इसका सबसे पाक प्रमाण हैं ये औरत !!


             अर्चना राज 

Sunday, 9 September 2012

सरहदें

स्पर्श की भी सरहदें हुआ करती हैं
अदृश्य , मौन , ठहरी हुई 
मखमली ओस के सख्त हकीकत सी ,

धूप  कतरा-कतरा धरती में ज़ख्म सा  इकठ्ठा है 
हसरतें भी आईने में काँटों सी दिखा करती हैं 

हवाओं को छूकर गुजरने की इजाजत नहीं है
और नमी यहाँ कोहरे में नज़र आती है
कोई सियाही सी है ठहरी  हुई जिस्म पर
कि हर कम्पन हर सिहरन यहाँ  प्रतिबंधित है
वक्त पहाड़ों सा ठहरा हुआ है दरमियाँ
दहलीज़ भी बेड़ियों सी चिपकी हैं गहराई में,

पर इश्क अब भी  पहाड़ी  चश्मों सा ही  हैं
हर बार रोक दिए जाने पर
पूरी शिद्दत से फिर-फिर फूट पड़ता है
सुलगता है नसों में पारा बनकर
पर सहम उठता है फिर भी बिखरने से पहले
कि  कोई दीवार जब हस्सास नज़र आती है,



हसरतें तो कब्र की कगार तक खड़ी हैं
पर सरहदें भी अब तक ज़िंदा हैं पुरनूर !!


हस्सास ---- संवेदनशील

पुरनूर ------- पवित्रात्मा 


        अर्चना राज 

Tuesday, 28 August 2012

रूहानियत

रूहानियत की दुनिया में सरहदें नहीं होतीं
रवायतें भी नहीं
यकीन का इक पाकीज़ा सिलसिला भर है ये ,

सांस दर सांस गहराता जाता है
फलक पे ठहरे आफताब की तरह ,

सदियों का फासला भी यहाँ दूरियां पैदा नहीं करता
बस कुछ अहसास बेहद खास हो जाते हैं
धडकनों की मौजूदगी का आइना बनकर ,

हवाओं में अक्स भी जिन्दा नज़र आते हैं
लफ़्ज़ों में जो  उम्र भर की दुआयें बन जाते हैं
बिना किसी कायदे और बिना किसी दायरे के ,

यहाँ इश्क भी बस इश्क होता है
अपनी पूरी शाइस्तगी
अपने पूरे ज़ज्बात के साथ  !!



          अर्चना राज 

Monday, 27 August 2012

प्रेम

एक पूरी उम्र के बूढ़े प्रश्नचिन्ह सी
खड़ी  हूँ मै तुम्हारे सामने
बेहद ख़ामोशी से ,

तुम्हारी नसों  में मेरा मौन
दर्द की लकीरों सा बिखर रहा है ,

कोई सवाल ..कोई शिकायत अब नहीं
मौजूद है एक गहरी अंतर्वेदना की चुप
हमारे दरमियान ,

पर प्रेम वस्तुतः अब भी है
शाश्वत ..अनंत ...अविरल !!!




      अर्चना राज 

प्रेम कहानियां

अनगिनत रंग-बिरंगे दुपट्टों में
पढ़ सकते हैं हम
लहराती हुई न जाने कितनी ही प्रेम कहानियां
तीखी - मीठी, चहकती, उबलती
शर्माती, खिलखिलाती ,दुपट्टे के कोरों पर उंगलियाँ मरोड़ती
कसमसाती प्रेम कहानियां ,

यौवन का बेशुमार होना ,उम्मीदों का आफताब होना
किसी से आँखें चार होना ,देखना,मुस्कुराना और प्यार होना
हर अंगुल भर दूरी पर खुशबू से लबरेज़ हैं
ढेरों जन्म लेती प्रेम कहानियां ,

सांस दर सांस, स्पर्श दर स्पर्श
महसूसते , गुनगुनाते ,न जाने कितनी धडकनों को
तरंगित /  आवेशित करती ये प्रेम कहानियां

आँखों की शरारत ,उँगलियों का स्पर्श ,अनजानी सी खुशबू
इनके ही इर्द - गिर्द घूमती हैं अक्सर प्रेम कहानियां 
पर आँखों में अश्क ,सीने में दर्द और धडकनों में तल्खी भी
होती हैं प्रेम कहानियाँ ,

तमाम प्रेम कहानियों को पढो ,महसूसो और किताब बंद कर दो
आमतौर पर जिन्दगी में दर्द और सूनेपन का
आसमान होती हैं ये प्रेम कहानियां
उम्र के ठहरे हुए पलों का सामान होती हैं ये प्रेम कहानियां !!


            अर्चना राज 

Wednesday, 22 August 2012

इंतज़ार

तुम्हारी बेजारी ने मेरे दर्द को
अब और भी सख्त कर दिया है
शून्य सी हो गयी हूँ मै
तुम्हारे निरंतर अस्वीकार के आघात से ,

मै सहम जाती हूँ तन्हाई के उस अंदेशे भर से ही
जहां  तुम्हारी यादें मुझे मेरी कांपती  हसरतों से रूबरू कराती हैं
आंसुओं की अनगिनत सूखी लकीरें भी सुलगती मोमबत्तियों सी महसूस होती हैं
जो अंततः थक कर मुझमे ही बेतरतीब दरिया सी पसर जाती हैं ,

धूप  का स्वाद भी अब पहले सा गुनगुना नहीं रहा
और न ही हवाओं में तुम्हारी बेताबियों की आहट बाकी  है
बेचैन रात  भी अब मुझमे तुम्हारी उमंगें  नहीं जगा पाती
क्योंकि शायद ढलती शाम ने अब तक भी तुमसे मिलाने का वादा पूरा नहीं किया है ,

कहीं कुछ बदल सा गया है
या संभव है तुम्हारी चाहतों ने ही शक्ल बदल ली है
पर मै अब भी वहीँ हूँ ठहरी हुई तुम्हारे इन्जार में
उसी परकोटे में 
जहां तब थी जब तुम थे  !!


               अर्चना राज 

Thursday, 16 August 2012

आह्वान

बहुतेरे सपने यूँ ही राख  हो जाते हैं कोई आकार लेने से पहले 
क्योंकि सुलगती भूख हमें सपने देखने की इजाज़त नहीं देती
और अक्सर उम्मीदें भी  उलझनों में जकड़ी हुई नज़र आती हैं 
कि जिसे सुलझाने का कोई सिरा कभी दिखाई नहीं देता ,

हमारा इंसान होने का गर्व
पहले ही कदम पर बिखरकर  रेत हो जाता है
और यही स्वतः स्वीकार्य जीवन परम्परागत चुप्पी बनकर 
हमें हर रोज सहते रहने को विवश करता रहा है ,

सदियों की सुप्त मानसिकता कछुओं की शक्ल में होती है
और इस मजबूरी और घुटन में
कई पीढियां खुद ही दम तोड़ती आई  हैं
बेहद स्वाभाविकता से... बिना कोई  आवाज़ उठाये ,

पर अब वक्त आ गया है
कि  हमें जगना होगा .. हमें लड़ना होगा
अपने सपनो , अपनी उम्मीदों
और उन अनगिनत रातों के लिए भी
जिसे हमने भूख से जूझते हुए काटी हैं
और उस खोये हुए सम्मान के लिए भी
जो एक इंसान होने पर स्वतः ही मिल जाया करता है
पर जिसे एक इंसान होते हुए भी हमने यूँ ही गँवा दिया है !!



           अर्चना राज
























Tuesday, 7 August 2012

अब तक

हसरतों की शाम का वो एक ख़ास लम्हा
आज भी मौजूद है वैसे ही तुम्हारे कमरे में
जब तुम्हारा स्पर्श कुछ कदम चलकर ठिठक सा गया था हवा में
और मेरा इंतज़ार भी वैसे ही जस का तस है
तुम्हारे कमरे की दीवार से सटकर ठहरा हुआ सा ,

नदी की वो रवानी भी मौजूद है हममे अब तक अपनी पूरी सिहरन के साथ
जब तुमने एक पत्ते पर हमारा नाम साथ- साथ लिखकर
बहा दिया था मेरी तरफ बड़ी शिद्दत से
जिसे छूते ही मै दरिया सी हो गयी
और मुझे देखकर तुम रेत से होने लगे थे ,

चांदनी रात की तमाम बेचैनियाँ भी मौजूद हैं हममे
जब वो धरती के हर इक गोशे को रौशन कर देता है आहिस्ता से चूमकर
और तब सारी कायनात रूमानियत से लबरेज़ हो जाती है
और बेहद अनियंत्रित भी सिवाय मेरे और तुम्हारे ,

पर हमारी ख़ामोशी भी अब तक वैसे ही है
जैसे किसी सरहद की रवायत हो या मजबूरी भी
कि  जिसका टूटना लाजिमी तो है
पर होना उससे भी ज्यादा जरूरी !!




                अर्चना राज 

Tuesday, 24 July 2012

इंतज़ार

तुम मुझसे प्यार न करो बेशक
पर इनकार भी मत करो
तुम्हारा इंकार मेरे वजूद पर गर्म रेत सा बिखर जाता है
और चुभता रहता है हर वक्त अंतर्मन में सरहदी काँटों सा
और जंगल की भयावहता भी तब मेरे अन्दर अनायास ही पसरने लगती है
विशाल झरने की छोटी सी बिखरी हुई बूँद की तरह अस्तित्वहीन
मै जूझती रहती हूँ निरंतर अपने अकेलेपन में ,

तुम मुझसे प्यार न करो बेशक 
पर इंकार भी मत करो 
कि तुम्हारा इंकार मुझे रेगिस्तान कि सुलगती धूप सा बना देता है
उबाऊ , थका , अंतहीन और लगातार लगभग दावानल में परिवर्तित होता हुआ सा ;
या फिर अटलांटिक कि उस ठण्ड जैसा भी
जहां कभी कोई सांस जी नहीं पाती ,

तुम मुझसे प्यार न करो बेशक 
पर इंकार भी मत करो 
क्योंकि तुम्हारा इनकार मेरे अस्तित्व पर एक प्रश्नचिन्ह सा नज़र आता है ;
एक बेमकसद जिन्दगी के दिशाहीन  सफ़र जैसा भी
कि जिसका होना कहीं कोई स्पंदन नहीं जगाता 
और न होना भी किसी ख़ास महत्व का हकदार नहीं  
ये व्यर्थता  मेरे  होने को ही लगभग अमान्य कर देती है ,  

पर तुमने क्यों नहीं किया मुझसे प्यार 
तुम्हारी नज़रों ने तो अपने बेताब हौसलों से इसे खुद कबूला था 
और तुम्हारे अंतस के बेइन्तहां  कम्पन ने तुम्हारे लिए मेरा होना 
लगभग अवश्यम्भावी सा कर दिया था ,


फिर क्यों तुम्हारे चेहरे की नमी एक रोज खुश्क हो गयी 
और क्यों तुमने मेरे लिए पूरी दृढ़ता से 
उन हवाओं को भी प्रतिबंधित कर दिया
जो मुझ तक तुम्हारे स्पर्श का एकमात्र जरिया थे ,


वैसे मै आज भी तुम्हारी नज़र के उसी मुहाने पर खड़ी हूँ 
जहां आखिरी बार तुम्हारी नज़रों के सर्द अहसास ने मुझे 
बेसाख्ता ही एक जीवित शिला में परिवर्तित कर दिया था 
और यहाँ मै तुमसे होकर गुजरी हुई एक तप्त लहर के इंतज़ार में हूँ 
जो मेरे लिए तुम्हारी चाहतो से भीगी हुई होगी
 और जो मुझे फिर से मेरे होने का यकीन 
और मेरे अस्तित्व को सार्थकता दिलाएगी  !!






                      अर्चना राज !!

















Sunday, 22 July 2012

धरोहर

सुलगती बारिश के साए तले
एक बार फिर मिले थे मै और तुम
पर वैसे ही ठहरे हुए और बेंइन्तहां धडकते हुए भी ,

निगाहों में  ही एक बार फिर ढेरों प्रश्न जगे थे
जिसके ज़वाब भी वैसे ही ख़ामोशी में  मिले
बंदिशों की पहरेदारी से अब तक बंधें हो जैसे ,

अब भी हमारे बीच अहसासों का एक पुल मौजूद है 
पर अब भी उसपर दहकते शोलों की इक लम्बी कतार है 
और अब तो उस पर न जाने कितने कैक्टस भी उग आये हैं ,

न जाने क्यों अब भी संस्कारों का एक पारदर्शी शीशा 
हमारे बीच ठहरा हुआ है 
और जिसे तोड़ने की अदम्य चाहतों के बावजूद भी 
हम कभी कोई  कोशिश तक नहीं कर पाए ,

पर फिर  भी बहुत कुछ है मेरे और तुम्हारे बीच हमें जोड़े रखने के लिए 
जैसे जाड़ों की कुछ गुनगुनाती धूप
या फिर बारिश की अंतहीन बेकाबू साँसें 
या फिर शायद वो एक अकेला स्पर्श 
जब मेरे दुपट्टे का किनारा तुम्हारी उँगलियों से होकर गुजरा था  
और जिसका बेहिसाब कम्पन अब तक मेरी धडकनों में वैसे ही मौजूद है  ,


और यही सब मेरे अब लगभग ख़त्म होते उम्र की धरोहर है
और मेरी वसीयत भी ...मेरे अगले जन्म के लिए !!







                           अर्चना राज
 



 

Friday, 20 July 2012

कभी-कभी

कभी -कभी हवाओं पे लिखे नाम भी सुलग उठते हैं
और दर्द बेहद सुकून देने लगता है ;
यूँ लगता है मानो इश्क की तकदीर लाल सियाही से लिखी है
इसीलिए तो अक्सर ही नज्मे ज़ख्म सी नज़र आती हैं ,

कभी कभी उसकी यादें भी बड़ी गैर जरूरी सी मालूम देती हैं
क्योंकि तब अनायास ही उसकी खुशबू मुझे
मुझे अपने कपड़ों में महसूस होने लगती है ... न जाने कैसे ,

कभी-कभी मै जी लेती हूँ उन लम्हों को भी
जो मुझे देखते ही बड़ी मासूमियत से हंस दिया करते हैं
और फिर बेसाख्ता ही दीवारों पर कुरेदे गए इक नाम से
नमी रिसने लगती है आहिस्ता-आहिस्ता ,

कभी-कभी यूँ भी होता है की उसका चला जाना
मुझे बड़ा स्वाभाविक सा लगता है
तकलीफ होती है तो बस ये कि उन कदमो के निशान
कभी मुझ तक वापस नहीं लौटे ,

और यूँ ही धीरे-धीरे एक सफ़र ख़त्म होता रहा
और ऐसे ही एक इश्क परवान चढ़ता रहा !!


                                 अर्चना राज !!

Tuesday, 17 July 2012

ग़ज़ल

तेरी नीमबाज़ आँखों में ये कैसा अब्र उतर आया है
जिसकी बेहिसाब बारिशों में भीग जाने को जी चाहता है ,

कशमकश तो यूँ भी बहुत है जिन्दगी में लेकिन
तेरे इश्क में दम-ब-दम जज़्ब हो जाने को जी चाहता है ,

सूरत ख्वाबों की तो यूँ हर रोज बदल जाती है
हर ख्वाब में पर अब तेरा ही दीदार हो ये जी चाहता है ,

तेरी साँसों को कैद करूं या गुम हो जाऊं तुझमे ही 
आहिस्ता-आहिस्ता यूँ फना हो जाने को जी चाहता है , 

हवाओं पे तेरा नाम लिखकर चूमा करूं निगाहों से 
हर ज़र्रा कायनात का तेरे नाम करने को  जी चाहता है !!



                             अर्चना राज 

बारिश की धरोहर

अब भी ठहरा हुआ है
बारिश की इक शाम के महफूज़ गोशे में
मेरी पहली बेताब धडकनों का कुछ हिस्सा
जब भीग रही थी मै छत पर पूरी अल्हड़ता से
सखियों संग हंसती - खिलखिलाती बेलौस उमंगों के साथ  ,

और तभी एक गुजरती हुई सी आहट थम गयी थी ठिठककर 
नज़र पड़ते ही दो खामोश आँखों की तीव्र तपिश को महसूस किया मैंने 
और जड़ हो गयी थी  ...उसकी तमाम कंटीली सिहरन के साथ ,

आहिस्ता से झिझकते हुए जब देखा मैंने उन आखों में 
तो उस पल से ही उसका तमाम अनकहा मेरी रगों में उतर गया 
इश्क बनकर ....जिसने मुझे बेहद अहम् बना दिया ...उसका बना दिया ,

पर तब से अब तक वो नज़र नहीं लौटी 
न जाने कहाँ गुम है
और तब से ही मैंने बारिशों में भीगना बंद कर दिया है ,



हर बार ...हर बारिश में मेरा दर्द और मेरा इन्जार भी 
उम्मीदों के साए में फुहारों की खुशबू संग मिलकर धडक उठता है 
साथ ही उन नज़रों का अनकहा यथार्थ भी मेरी रगों को अनायास तप्त कर देता है ,


पर हर साल बेहद मायूसी से  अनजाने ही 
मै कुछ और बड़ी ...कुछ और अहम् हो जाती हूँ खुद में
एक और पूरे साल तक उन नज़रों की तासीर को जीते रहने के लिए  
एक और साल तक बारिश में एक ठिठकी हुई आहट के लिए !!










                                   अर्चना राज




Wednesday, 11 July 2012

अग्नि / प्रेम

न जाने कितनी सदियों पहले
स्वयं अग्नि ने ही जिया था प्रेम को
परन्तु फिर भी
तब से अब तक अनगिनत बार
उसने ही पथरीले सैलाबों से अवरोधित किया है
प्रेम की अनुभूति को
न जाने क्यों ,

अपने तप्त और तल्ख़ खयालातों के साए में
उसने जितना ही खुद को ढंकने की कोशिश की है
बार-बार उतना ही नाकाम होता रहा है उसका ये प्रयास
क्योंकि हर बार उसके सुर्ख दर्द के चट्टान पर 
बेहद सहजता से उग आते हैं
प्रेम की खुशबू से परिपूर्ण
अनगिनत रंगों वाले फूल
जिनका मतवालापन सारी सृष्टी में 
आहिस्ता-आहिस्ता बिखरता रहता है ,

शायद इसलिए भी कि
उसकी बर्फीली तटस्थता में भी 
प्रकृति का जिद्दी प्रेम लगातार सुलगता रहा है
बेहद स्वाभाविकता से 

उसके न चाहते और 
खुद को संयमित रखने की पूरी मर्मान्तक चेष्टा के बावजूद भी ,

बजाय इसके की अग्नि अपनी पूरी सख्ती से 
प्रेम के अस्तित्व को नकार सके 
उसकी कठोरता ने अनजाने ही अनायास 
प्रेम को अग्नि में परिवर्तित कर दिया है ,

और अब एक बार फिर अग्नि पूरी तरह तत्पर है 
प्रेम का गरिमापूर्ण स्वागत करने 
 और प्रकृति से अपने मिलन को 
कुछ और चंचल,मदहोश ,और उद्दात्त बनाने के लिए !!







              अर्चना राज

Saturday, 23 June 2012

कहाँ हो तुम

·
कहाँ हो तुम ...किस अनजानी सतह पर ठहरे  हुए हो
कौन सी है वो दहलीज़ जो तुम्हें आने की इजाजत नहीं देती
या फिर तुमने ही उसे कभी पार नहीं करना चाहा ,

तुम्हारी उम्मीद मे तो
ये सड़क भी अब नदी मे तब्दील हो गयी है
शायद उससे भी मेरी बेचैनीयों की तपिश झेली नहीं गयी
या फिर ये भी हो सकता है कि
मेरे दर्द ने उसे इश्क बनकर बहने को मजबूर कर दिया हो ,

रात के आसमां से भी स्याही बिखरती रही है
बूंद दर बूंद
और बड़ी सख्ती से नामंजूर  कर दिया है उसने
बादलों के थमे रहने की गुजारिश को
शायद इसलिए ही सुबह की रौशनीमे
मुझे खुद की शक्ल गुजरे वक्त सी नज़र आई
जिसके पैरहन पर जगह जगह
तकलीफों के पैबंद चस्पाँ नज़र आते हैं
और उस दुल्हन की तरह भी
जो एक लंबे   इंतज़ार के बाद अचानक
सफ़ेद लिबास मे नज़र आने लगी है ,

क्यों नहीं आए तुम ..कहो तो
की यहाँ तुम्हारे इंतज़ार मे
हर लम्हे ने इक सदियों की उम्र गुजारी है
 और मेरी चाहत भी मेरे उम्र के दरारों से ही नज़र आने लगी है ,

कहाँ हो तुम
की तुम्हें नज़र नहीं आया
मेरा हवाओं मे बेसाख्ता  तुम्हारा नाम लिखते रहना
या फिर आंसुओं से तुम्हारी तस्वीर बनाना ,

आ जाओ की अभी भी
उम्र का इक हिस्सा बाकी है
जहां मै तुमको अपनी पनीली आँखों
और कंपकंपाते जिस्म मे जी लेना चाहती हूँ
 गुनगुनाना चाहती हूँ
की इक उम्र अभी बाकी है
इक दौर अभी बाकी है!!



          अर्चना राज !!

Tuesday, 15 May 2012

माँ

मिटटी को रगड़कर जिस्म से अपने ज़रा सोचो
खुशबू है जो इसकी क्या तुम्हें खुद की नहीं लगती,
 
इसी का तत्व तुममे है जो तुम अब भी सलामत हो
इसी के आब से तुम अब भी इक ज़िंदा इबारत हो ,

सीने पर इसी के तुम खडा संसार करते हो
तो फिर क्यों आज इसके सत्य से इनकार करते हो ,

आया वक्त है कि तुम करो स्वीकार अब इसको
कि मिटटी माँ का ही प्रतिरूप है खामोश रहकर भी !!




                                           अर्चना "राज "

क्षणिकाएं ---मई----१२

छलककर आसमां से दर्द का दरिया ज़मीं पहुंचा
समंदर हो गयी धरती कुछ ऐसे इश्क जब तड़पा
सुकूं आता नहीं मुझको तेरे तस्कीन वादों पर
तेरा दामन रूहानी हो कहर कुछ इस कदर बरपा !!

गुजरी हुई यादें नहीं अफसाना भी मौजूं है ये
बीती हुई बातें नहीं जीनत है ये हर आह की
तेरी अंजुमन से गुजर रही सरे राह जो पर्दा किये
सजदा करो झुक कर ज़रा की ये अब भी आफताब है !!

कहीं भी कोई शख्स तुझसा नहीं होगा
ऐसा जुनूनी इश्क भी मुझसा नहीं होगा
होने को तो हों लाख किस्से मुहब्बत के
मेरी इबादत सा मगर किस्सा नहीं होगा !!

कल चाँद मेरी छत पर उतरा यूँ तारों की सौगात लिए
रात की सब्ज़ सियाही को अहसासों से आबाद किये
सिमटी सी मै शरमाई थी कुछ कुछ ऐसे घबराई थी
वो लेकर मुझको पहलू में खुद ही बादल सा बरस पडा !!

रोने को तो न कोई बहाना न सबब चाहिए
तू मेरा है यही यकीं मुझे बस अब चाहिए
मानूंगी तभी जब तू कहेगा अपनी आँखों से
तेरी आँखों में मुझे वरना खुद का दर्द चाहिए !!

Monday, 14 May 2012

क्षणिकाएं ..मई ---१२

आसमान की सियाही तेरी धडकनों में उतार दूं
जो तू बरसे बेहिसाब तो मै खुद में संभाल लूं !!

चटके आईने में तेरी सूरत पूरी नज़र नहीं आती
छलक उठते हैं जब अश्क तो दूरी नज़र नहीं आती !!

नमी की आस में भटका किया मै यूँ ही दर-ब-दर
जो बरसो तो बेहिसाब की भीगूँ मै बेहिसाब !!

थाम लूंगी समन्दर को भी अब दामन में अपने
कि मै भी लहरों पर चलने का हौसला रखती हूँ !!

अब्र को मै कैद कर लूं अश्क के आगोश में
दिल मेरा रोयेगा फिर भी दरिया हो जाने तलक !!

दोस्ती कि शक्ल में अपने भी खंज़र उठाये फिरते हैं
इस तिलस्मी दुनिया में अब दुश्मन करीब लगते हैं !!

सामने आकर ज़रा इक बार ये कह दो कभी
दोस्ती कि शक्ल में तुम दुश्मनी के साथ हो !!

रात का आइना मुझे मेरी बेबसी दिखाता रहा
मै रात भर रोती रही वो रात भर हंसता रहा !!

शाखों कि बारादरी में यूँ बैठे हुए मुद्दत हुई
उगने लगा इक शाख मुझमे भी तेरी उम्मीद का !!

मुफलिसी वो खंजर है जो सामने आकर ही वार करता है
हलाल होती हैं इसमें जिंदगियां मय अरमान बहुत आहिस्ता से !!

तेरी जुस्तजू तेरी चाह में ये तमाम उम्र यूँ गुजर गयी
इक चाँद था वो भी गया इक नज़्म जैसे पिघल गयी !!

उदासी चाँद कि अब अब्र कि बूंदों सरीखी है
बरस जाए जो ये अब चांदनी पर तो करार आये !!


































Saturday, 12 May 2012

क्षणिकाएं ----जनवरी १२

चलो अब गर्म सलाखों से लिखें तकदीर चट्टान के पन्नो पर
कि अश्कों में डूबी कलम तो इरादों को कमजोर बना देती है !!

कुदरतन शौक है दिल को लगाना आपका
न यूँ खेला करो इनसे ये नाज़ुक चीज़ होती है !!

उलीचकर तमाम दर्द इस कदर गंगा में मिला दिया मैंने
कि तेरे इश्क की बेवफाई को रुसवा नहीं किया मैंने !!

दर्द का आबशार कुछ इस तरह नुमुदार हुआ ज़माने में
परदे की कोशिश में दुपट्टा भी बेहिसाब ज़ख़्मी नज़र आया !!

तू कहता है की तू अब वो नहीं है जो तू पहले था
मै कैसे मान लूं की इश्क भी चेहरे बदलता है !!

चलो जी लें ज़रा कुछ देर साँसें अब भी बाकी हैं
की मरने की भी हसरत अब तो यूँ  मरने नहीं देती !!

अपने ज़ख्मो को मेरी पलकों से छू लेने दो मुझे
अपने अश्कों को मेरे अश्कों में यूँ ही घुल जाने दो !!

मुझे समेट लेने दो अपने दामन में तुम्हारे दर्द सारे
और अपनी रूह के संग तमाम उम्र यूँ ही बिखर जाने दो  !!

बुझने लगता है रिश्तों में अलाव कुछ वक्त के बाद

जमने लगती हैं फिर वहां बर्फ की सतहें आहिस्ता से !!

रूह से गुजरकर जो इक आह बिखर गयी है इस तमाम कायनात में
इश्क की खुशबू महसूस होने लगी है अब उसमे बेइन्तहां दर्द की जगह !!

सीपियों में मोती सा पलता है उसका इश्क सदियों तलक 
समंदर की ये बेइन्तहां बेचैनी यूँ बेवजह नहीं हुआ करती !!
  
क्यूँ तैरता है मेरा ज़िक्र उन हवाओं में जहां बारूद की खुशबू आती है
सरहद के पार गुमनाम अंधेरों में भी
क्या सिसकियाँ सुनाई देती हैं!!

जिन्दगी के आईने में ये किसकी शक्ल 
इतनी बूढी इतनी ज़र्द नज़र आती है 
ये तुम हो या मै हूँ या फिर हमारा नसीब
 जो इश्क के ईमान की पैदाइश है !!

मुट्ठी में जिन्दगी के है कैद लम्हे इतने 
गुजरते हैं दरमियान जो साँसों से रेत जैसे 
अहसास नहीं होता खोने का इनको अक्सर 
बस  आँख है भर आती आइना फकत देखकर !!























Friday, 11 May 2012

क्षणिकाएं ---मार्च १२

दर्द बेहद हो तो कराह उठता है बेमकसद भी
करार आता नहीं फकत मौत नज़र आती है !!

फलक पे चाँद ठहरा था ज़मीं पे तुम नज़र आये
तो यूँ सोचा तेरे दामन में सारी शब् गुजर जाए !!

 इश्क यूँ होने और न होने के बीच की कशमकश भी है
 गुजर जाती है उम्र अक्सर इस समझ की आज़माइश में !!

पुकारा था तुमने इक रोज मेरा नाम बड़ी शाइस्तगी से
ठहरा हुआ है हवाओं में जो अब तक ख़ामोशी बनकर !!

हवाओं के दामन में देखो कितने ही ज़ख्म पला करते हैं
फिरती रहती हैं फिर भी ये अश्कों को आँचल में सहेजे !!

लगा था उम्र यूँ ही गुजर जायेगी तन्हाइयों से लड़ते हुए
सितारा फलक से टूटा तो आसमा हमदम लगने लगा !!

मुस्कुराहट अपने लबों पर अब सारी उम्र यूँ ही बिखरने दो
उदासिया तो तुम्हारे शहर की तमाम मै समेट लायी हूँ !!

सहमकर उस पल ही दर्द मेरा थम सा गया था
जिस पल तेरी आँखों में मैंने चाहत को पिघलते देखा !

ठहरो ज़रा की मै थाम लूं इन धडकनों के राग को
जो बिखर गए ये फिजां में तो फिर रागिनी बन जायेंगे !!

जला करते हैं जब अरमान मुहब्बत के
तो भला किसको ये ख़याल आता है
बेचैनियों का कारवाँ तो अक्सर ही
बस अश्कों के सैलाब से गुजर जाता है !!

उदासियों की चादर बनाकर
मुझे ओढने - बिछाने दो
सिमटने दो खुद को
इनके तल्ख़ दामन में

मेरी ही पीड़ा से जन्मी है ये
मुझमे ही फना होने के लिए !!


Thursday, 10 May 2012

क्षणिकाएं ----------- अप्रैल १२

फौलादी इरादा है ज़माने को दिखा दो तुम

सच्चाई कभी भी झुक के यूँ टूटा नहीं करती !!



चाँद का भटकना यूँ तमाम रात और तेरा गुम हो जाना

तुझे अहसास भी है की कितनी आहों का तसव्वुर है तू !!



तन्हाई का आलम और ये तेरी यादों का दर्द बेशुमार

तप्त आँखों में पलते आंसू भी अब मौन हुए जाते हैं !!



गुजर जाए तो यूँ कहना की ये तो वक्त था चला गया

सिमटकर तो पहलू में अब यादें भी नहीं रहतीं !!



गुजरते लम्हों को यादों की बैसाखी मत बनाओ

जी लेने दो इसे यूँ खुद का तसव्वुर बनकर  !!



इश्क यूँ होने और न होने के बीच की कशमकश भी है

गुजरती है उम्र अक्सर इसी समझ की आज़माइश में !!



जिन्दगी दर्द के कतरों में बंटा अफसाना है

अब यूँ करें की इसे वक्त के पन्नो में समेटे  !!



सफ़र ख़त्म हो चला है मगर मंजिल नज़र नहीं आती

अब तो रास्तों के कंकड़  भी हमराह से लगने लगे हैं !!



संभलकर चलना की रास्ता मुश्किल है बहुत

ये इश्क है दिल बहलाने का सामन नहीं !!



क़त्ल कर दो या क़त्ल का सामन मुहैया कर दो

अब यूँ रोज थोडा-थोडा नहीं मरा जाता मुझसे !!



पलटकर थम सी जाती हूँ तेरी आहों के साए में

तेरी हर सांस मुझमे इस कदर हलचल मचाती है !!



इक नज़्म लिखी है साँसों ने , इक नज़्म कही है आहों ने

इक नज़्म अश्कों में बदल गयी और दरिया को सैलाब किया !!



चाँद के जिस्म से यूँ आह का तूफ़ान बरपा

सिसक उठी कायनात भी दरिया बनकर !!



तकलीफ दिल की बड़ी आन से छुपाया तुमने
कहा कुछ नहीं बस मुस्कान दिखाया तुमने
दर्द यूँ बेचैन दरिया सा उफान रहा था तुममे
पर ये इश्क भी बड़ी शान से निभाया तुमने !!





 



























































Wednesday, 9 May 2012

क्षणिकाएं ----------- अप्रैल १२

लफ़्ज़ों में वो तासीर कहाँ जो मेरे इश्क को बयान कर पाए

जानना है तो देख मेरी आँखों में ठहरे इन सुर्ख पहाड़ों को !!



जिन्दगी को ये हक़ नहीं की वो मेरी रूह को छू ले

बस एक तेरा आना ही वहां मुझको सुकून देता है !!



तेरे कदमो के निशाँ आज भी बड़ी दूर तलक नज़र आये

लहरों ने यूँ सहेज रक्खा है उसे अपनी नमी के साए में !!




रूह सिमट जाती है मेरी यूँ उफककर तेरे दामन के साए में

मानो इक सांस के सहमेपन ने धडकने की गुस्ताखी की हो !!




दर्द बेहद हो तो बस कराह उठता है बेमकसद भी

करार आता नहीं फिर फकत मौत नज़र आती है !!



शब् भर तेरी यादें यूँ साए सी लिपट जाती हैं मुझसे

कि तेरे होने का आभास ही मुझे पाकीज़ा बना जाता है !!



फलक पे चाँद ठहरा था ज़मीन पे तुम नज़र आये

तो यूँ सोचा तेरे दामन में सारी शब् गुजर जाए !!































क्षणिकाएं

रो रो के कर चुके हैं फ़रियाद तुमसे इश्क की

हंस हंस के जिसको तुमने यूँ आइना दिखा दिया !!



इक रहगुजर है सामने जाती नज़र जहां तलक

इक तुम हो इतने पास कि आते नहीं नज़र कभी !!



गुजरती नहीं है रात सवालों की शक्ल में

जवाबों का इंतज़ार सलीबों सा हो गया !!



 बाबस्ता हूँ कुछ इस कदर तेरे ख्यालों में हमनफज मेरे

मेरे दहलीज़ पर तेरा आना भी नज़र नहीं आता मुझको !!



सब्र टूटा नहीं है मेरा की उम्मीद अभी बाकी है

हर सांस जीती हूँ तुम्हें पर रीत अभी बाकी है  !!



मेरे ज़ख्मो को आंसुओं की बारिश में बदल जाने दो

थाम लो मुझे अपनी बाहों में और बिखर जाने दो !!



अहसासों की कशमकश में कुछ शब्द बिखर जाते हैं

जिन्दगी बेमकसद ही तो दर्द की तस्वीर नहीं होती !!



सड़कों की रौशनी में भी बना करती है तकदीर यूँ तो

मुकद्दर संवारने को कभी बहाने की जरूरत नहीं होती !!



धडका करती है तेरी आहट भी मेरे खामोश दरीचे में

तेरे कदमो के निशान मुझे वहां अब भी नज़र आते हैं !!



चमन में फूल भी उगते हैं संग काँटों के साए में

बिखर जाती है ये मुस्कान भी अश्कों तले छिपकर !!



मुस्कुराने की जद्दोजहद में अश्क फिसल जाते हैं

यादों को जीने का सलीका सबको नहीं आता !!



मिटटी से इक अंकुर फूटा बीज बना हरियाली 
गहन वेदना से ही उपजे खुशियों की किलकारी 
बिखरी है कण कण में यही चेतना बनकर माया 
सृष्टी की रचना से ही गतिशील है दुनिया सारी !!






























क्षणिकाएं

तुम्हारे अंतस से उपजी पीड़ा छलक उठती है मेरी आँखों से

तुम्हारे दर्द का दरिया मैंने खुद में कुछ यूँ थाम रक्खा है !!



धडकती आह के साए में पलता दर्द अब थकने लगा है

सुनाई पड़ने लगी है आहट भी अब इक खामोश सफ़र की !!




बिस्तर की सिलवटों में किसकी हैं ये बेचैनियाँ

ये कौन है जो रात भर सज़दे में बस रोता रहा !!



बस चाँद की उम्मीद में हर रात वो जगती रही

आया भी जो कमबख्त तो पहलू बदलकर सो गया !!



नज़रों से यूँ बाजीगरी दिखाया नहीं करते

करते हैं अगर इश्क तो रुलाया नहीं करते

कह दो बस एक बार की हो तुम भी बस मेरे

ना कहके मुझे हर बार यूँ सताया नहीं करते !!

क्षणिकाएं

रोने का तो न कोई बहाना न ही सबब चाहिए

तू मेरा है यही विश्वास बस मुझे अब चाहिए

यकीं होगा जो तू कह पाए ये अपनी आँखों से

तेरी आँखों में वर्ना मुझको खुद का दर्द चाहिए !!





 सामने आकर ज़रा इक बार ये कह दो कभी

दोस्ती की आड़ में तुम दुश्मनी के साथ हो !!



दोस्ती की शक्ल में अपने भी खंज़र उठाये फिरते हैं

इस तिलस्मी दुनिया में अब दुश्मन करीब लगते हैं !!



अब्र को मै कैद कर लूं अश्क के आगोश में

दिल मेरा रोयेगा फिर भी दरिया हो जाने तलक !!



थाम लूंगी अब समन्दर को भी दामन में अपने

की मै भी लहरों पर चलने का हौसला रखती हूँ !!




नमी की आस में भटका किया मै यूँ ही दर-ब-दर

गर बरसो तो बेहिसाब की भीगूँ मै बेहिसाब !!


 चटके आईने में तेरी सूरत पूरी नज़र नहीं आती

छलक उठते हैं जब अश्क तो दूरी नज़र नहीं आती !!


            archanaa raj 



Tuesday, 8 May 2012

???

कौन है अपना यहाँ

है किसे फुर्सत
जो देखे
पीर की अंगनाइयां
और रंग अश्कों में घुला,

खुद उठाकर
छोड़ दे जो
बीच लहरों के भंवर में
क्यों वो सोचेगा कभी
ये दर्द जो दिल में उठे,

खींचकर पल्लू
वो जिसने खुद चुना
अपने लिए
जब बजीं शहनाइयां
और स्वप्न
भी दिल में खिले ,

वो सजग प्रहरी ही जब
यूँ थामकर बाहों में अपने
सौंप देगा मृत्यु को
तब कौन है अपना यहाँ !!

अर्चना "राज "

Monday, 7 May 2012

स्पर्श

कभी आओ
छू लो मुझे
और मोम का दरिया कर दो ,

तेरे जाने पर
दर्द के पिघलने का
इक सहारा तो हो जाय ,

अभी तो मै
बस इक
पत्थर सी नज़र आती हूँ ,

टकराऊं भी तो
दर्द टुकड़ों में बंटकर
कई गुना बढ़ जाता है
हमनफज मेरे !!

अर्चना राज

Sunday, 6 May 2012

जीवन दर्शन


 यहाँ मुहब्बत का अर्थ जीवन और मुस्कुराहटों का अर्थ दर्शन से है ..तुझे ..जीवन को संबोधन भर है
 रंगों और खुशबुओं का तात्पर्य सभ्यता और संस्कार से है जो हमारे भारतीय परम्परा की अमूल्य धरोहर हैं !


 मुहब्बतों की शक्ल अक्सर मुस्कुराहटों से जुदा होती है
तुझे जानकर ही ये जाना मैंने ,

कच्ची धूप में कभी मूरत नहीं पकती
न ही बर्फ के टुकड़ों से मिटटी सानी जाती है
बेहद आवश्यक होने पर भी यहाँ रंगों और खुशबू का जिक्र बेमानी है ,

मुहब्बतों की मूरतों को तो विशुद्ध घाम में जलना पड़ता है , तपना पड़ता है 
तब कहीं इसके साकार होने के प्रक्रिया की शुरुआत भर होती है 
एक-एक दरार को पाटने के लिए 
खुद को पानी सा कर लेना होता है , रंग गंध स्वाद हीन 
जिसका अस्तित्व घुलकर परिवर्तित होने के गुणों के कारण ही सुरक्षित है,

सूरज जब चरमोत्कर्ष पर अपनी हथेलियों को आहिस्ता-आहिस्ता फैलाता है 
और अनगिनत अक्षय उर्जा का भण्डार मानो एक-एक कर 
समस्त धरती पर बिखरता चला जाता है 
तब ही तो पहली सांस जनमती है मूरत में 
और तब ही उसके जीवंत होने की सार्थकता भी उभरती है 
अब इन्द्रधनुषी रंगों से सजाये सँवारे जाने के बाद ही 
पूरे आत्मविश्वास से मुहब्बतों में मुस्कुराहटों का मिलन होता है 

और इनका ये मिलन एक खुशबू की तरह जीवित रहता है 
पूरी सृष्टि में , अनंतकाल तक के लिए !!



                           अर्चना "राज "

Friday, 4 May 2012

सृजन

सृजन होगा

घनी पीड़ा में
घने ताप में
गहन अवसाद में
निराशा के कोटर में भी
सृजन होगा ,

सृजन होगा
क्योंकि ये विश्व रचित है
निर्मित है
गतिशील है
तो संभावनाओं के परे भी
सृजन होगा ,

खुली धूप में
गहन अन्धकार में
धुंआधार बारिश में
उफनते समुद्र में
आशा की ऊँगली थामे
सृजन होगा ,

सृजन होगा
क्योंकि सृष्टि है
सत्य है
शिव है !!

अर्चना "राज "

Thursday, 26 April 2012

रूहानी अहसास

दो रूहानी अहसास
सदियों कैद रहे
शीशे के एक बड़े से पारदर्शी कमरे में ;
जहाँ ठीक बीचोंबीच मौजूद थी
शीशे की एक मजबूत सी दीवार भी,

देखते और महसूस करते रहे वो एक दुसरे का होना ..क़यामत की तरह ,
बेचैन धड़कने अचानक घबराकर थम सी जातीं ;
और फिर अनायास ही बेहिसाब धड्क्तीं ,

दीवार की दोनों तरफ दोनों थे ;पर आधे - आधे बंटे हुए ,
दोनों की आँखों से छलकती अब्र की बूँदें ..दोनों को
दो अलग-अलग जिस्मो के आधे -आधे बंटे हिस्से  के
एक होने का सा सुकून देते ,

अजब सी बेचैनी ; जब उनके दामन से पिघलकर
खुशबुओं सी बिखरने लगती ;
तब पास बहती नदी तक दोनों साथ जाते
एक साथ ..पर वही, आधे-आधे बंटे हुए ,

इश्क की बेईन्तहाँ  आवारगी ;उनकी उँगलियों में सिमटने लगती;
पर छूने की कोशिश में एक सर्द और कठोर दीवार से टकरा जाती,

दरअसल , वो शीशे का कमरा तो वहीँ रहता
पर बीच की दीवार इनको  नामालूम सी , इनके साथ चलती,
यहाँ भी .... बीच में ,

अहसासों के तमाम जंगलों की ख़ाक छानते ;
दिन भर यहाँ वहां भटकते ;
और फिर थककर नदी की ठंडी धारा में पैर डुबो देते,
साफ़ पानी में अपना अक्स देखते
पर फिर वही .... बंटा हुआ,

मासूमियत बगावत में बदलने लगती;  पर फिर
बेचारगी रात की स्याह चादर सी
उनकी उम्मीदों पर छा जाती ,

दोनों थके कदमो से मायूस;खामोश वापस लौटते;
और एक बार फिर कैद हो जाते ;
शीशे के उसी कमरे के अपने अपने हिस्से में;
जहाँ मौजूद थी ठीक बीचोंबीच
वही कमबख्त ..मजबूत शीशे की दीवार ,

रात भर दोनों देखते रहते तप्त आँखों से
की किस तरह लहराती सी चांदनी
इठलाती ..बलखाती; किसी के आगोश में सिमटने को
दौड़ी सी चली जाती है ,

वो उसके आगोश में होने को महसूस करते
रात भर ..पर एक दुसरे की धडकनों में.. उनकी लय में
बेचैन आँखों से देखते हुए ;
और यूँ ही सदियाँ गुजरती रहीं
रात की तन्हाई के साए सी....!!!!


                     अर्चना "राज "

Monday, 23 April 2012

सपने


मिटटी की सतह पर फसल के साथ उगा करते हैं तमाम सपने भी
पलते हैं जो उसी की खाद पानी की उर्वरता के साथ ,

भोलू के सपनो में अक्सर दीखता है घर पे चमचमाता टीन का छप्पर
की जिसके होने से इस साल बारिश में राधा भीग भीगकर बीमार नहीं पड़ेगी ,
तो मनसुख की आँखों में बच्चों के पैरों में रंग बिरंगी चप्पलों और स्कूल ड्रेस का सपना है
जो उनकी फटी बिवाइयों और स्कूल न जा पाने की विवशता से उसे हरदम कचोटता रहता है ,
धनुआ बेटी की शादी इस साल कर ही देना चाहता है नहीं तो एक साल और पार करना होगा 
और फिर बात उसके रोटी -पानी की ही नहीं बल्कि धोती वगैरह के यक्ष प्रश्न से लड़ने की भी तो है ,

कईयों के सपने ऐसे ही फसलों संग हरियाते हैं , फूलते - फलते हैं ,
कभी - कभार पक भी जाया करते हैं
पर अक्सर ऐसा होता है की फसलों के काटने से पहले ही
सपने अपनी जड़ों से उखड जाया करते हैं ,
और सपनो की जगह भूख उपज आया करती है
और वो टिक्कड़ भी जो वो चटनी के आभाव में नमक से ही खा लिया करते हैं
और भरपेट पानी पीकर सोते हैं अगले सपने के जन्मने की चाह लिए ,

दरअसल हमारे सपने शहर की चकाचौंध में नहीं
बल्कि गाँव के सन्नाटों में जन्मा करते हैं ,
सरकार की किन्हीं नीतियों में नहीं
पेट पर कपडा बांधे सोने की नाकाम कोशिश करती हुई आँखों में पलते हैं,
किसी भी GDP GROWTH या सालाना TURN OVER से नहीं
बल्कि फसल काटने की उम्मीद में आगे बढ़ते हैं ,
और किसी भी ANNUAL REPORT से नहीं बल्कि
एक बारिश या सूखे से ही अपने अंजाम को पहुँचते हैं ,

ये मेरे और आपके सपने हैं
जो भूख से उपजते हैं और मरोड़ पर आकर ख़त्म हो जाते हैं ,

एक बार फिर से जन्मने के लिए
क्योंकि ये तो सपने हैं जिन्हें देखना अब तक  TAX FREE है !!




                                      अर्चना "राज "



मनुष्यत्व 2

रिश्तों में अनजाने  ही  उगने लगी है अब मौत की परछाइयां
अचानक लील जाती है जो पूरी शिद्दत से एक पूरे आशियाने को ,



घर घर में पसरने लगी  है अब बेचारगी की अमरबेल भी ऐसे
और जैसे ख़त्म होने लगा है अब आँखों में यूँ  सपनो का उगना  ,


अपनी नकारात्मकता को ही  हमने अपना सर्वस्व बना डाला है 
कि मनुष्य होने के असली मायने तक समझ नहीं आते हमको ,



फिर से आहट सुनाई पड़ने लगी है अब एक और समुद्रमंथन की  
और आज फिर जरूरत महसूस होने लगी है एक साकार शिव की ,


वो शिव जो समाज का तमाम गरल ग्रहण कर नीलकंठी बन सकें  
और वो शिव भी जो मुस्कुराते हुए ही हमें जीवन दर्शन समझा सकें !!







                                 अर्चना "राज "

Saturday, 21 April 2012

बचपन सुहाना

बहुत याद आता है बचपन सुहाना

गाँवों के रस्ते पे मिटटी उड़ाना
भरी दुपहरी में अमराई जाना
अमिया के चक्कर में बाज़ी लगाना
यूँ गिरते पड़ते ही मौजें मनाना
बहुत याद आता है बचपन सुहाना ,

भाई बहनों संग मिलकर हंगामा मचाना
जलती धूप में नंगे पैरों भटकना
माँ का वो कसकर इक चांटा लगाना
रोते हुए ही फिर मुझको मनाना
बहुत याद आता है बचपन सुहाना ,

वो अंधी बुढ़िया को हरदम सताना
खीझे जो वो तो ठहाके लगाना
उसकी लाठी को लेकर फिर दौड़ जाना
गलियां उसकी सुनकर भी उसको चिढाना
बहुत याद आता है बचपन सुहाना ,

खेतों की मेड़ों पे चक्कर लगाना
गेहूं की बाली से दाने चुराना
भाई का हंसकर यूँ आँखे दिखाना
फिर खुद ही हाथों में भरकर थमाना
बहुत याद आता है बचपन सुहाना ,

बरगद के नीचे गुड्डे - गुडिया बनाना
सखियों संग मिलकर फिर ब्याह रचाना
बिदाई के वक्त कुछ आंसू बहाना
इक दूजे संग फिर खूब खिलखिलाना
बहुत याद आता है बचपन सुहाना ,

बहुत याद आता है बचपन सुहाना !!

अर्चना "राज "

Thursday, 19 April 2012

व्यथा

मेरे दर्द की अदृश्य सतह से गुजरकर
मेरी रूह को इस कदर ज़ख़्मी किया है तुमने
की मेरी रूहानियत भी अब गहन पीड़ा के तबस्सुम से नम हो गयी है ,

पर मै अब भी तुम्हारे  अक्स को हवाओं के कोरे पन्नो पर उकेरकर 
यूँ ही लगातार घंटों अपलक निहारती रहती हूँ 
और अनायास ही एक लहर न जाने कब आहिस्ता से मेरी धडकनों में उतर आती है
और मै सिहर उठती हूँ ,

 सदियों तक मैंने तिरस्कृत धरती का भाग्य जिया है 
बस एक तुम्हारी उम्मीद की ऊँगली थामे 
कि कभी तो तुम बरसोगे....मेरे लिए 
पर जब भी तुम बरसे तो यूँ लगा 
की ज़ज्ब होने से पहले ही तुम भाप बनकर जुदा हो गए ,

फिर भी तुम्हारी सारी उपेक्षाओं से  ही मैंने 
अपनी सतह पर फैली तमाम दरारों को पाटने की पूरी कोशिश की है 
पर तुम न जाने क्यों उन्हें भी रह-रहकर अग्नि में परिवर्तित कर देते हो  ,
शायद अंतहीन पीड़ा से ही कभी सुख का अभ्युदय हो  
यही सोचकर मै सारा दावानल अंतस में सहेज लेती हूँ ,

इस अग्नि को मै खुद में परत दर परत इकट्ठा करती रही हूँ 
उस दिन के इंतज़ार में जब मै बेसाख्ता अपनी सतह से बाहर निकल कर फट पडूँगी 
और तब तुम चाहकर भी खुद को बरसने से रोक नहीं पाओगे 
और उस दिन ये तमाम कायनात भी उस  बर्फीले ज्वालामुखी के सैलाब में सराबोर हो जाएगा ,

धरती के व्यथा की परिणति तब उसके चरम सुख की अनुभूतियों में  होगी
 और तब उस दिन एक नए इतिहास की भी  रचना होगी !!




              अर्चना "राज "


Tuesday, 17 April 2012

तुम्हारी ख़ामोशी

तुम अब भी खामोश हो ...........
ख़ामोशी क्या अब भी तुम्हे शब्दों से ज्यादा सुकून देती है
या फिर इसकी ओट में तुम मुझसे वो सब कहने से
खुद को रोक पाते हो जो मै बहुत शिद्दत से सुनना चाहती हूँ ,

क्या मेरा चाहना तुम्हारे लिए रेत के उस घरौंदे की तरह है
जो बनते हुए ही बार-बार, न जाने कितनी बार बिखर जाया करता है
या फिर सहरा में उडती उस अदृश्य लहर की तरह
 जिसका न थमना भी रेत के समन्दर के लिए कोई मायने नहीं रखता ,

बासंती हलचलों से तुम क्यों इस कदर घबरा जाया करते हो
और क्यों पक्षियों का कलरव भी तुम्हें शोर सा लगता है ,
दिन की गुनगुनी धुप भी तुम खुद में नहीं संभाल पाते
और न ही चाँद की आशिकमिजाजी को नज़र भर देखने की चाह रखते हो ,

आसमान पर लहराता सिन्दूरी आँचल भी क्यों कभी तुममे उमंगें नहीं जगाता
और क्यों तुम तमाम प्राकृतिक हरियाली को मेरी साड़ी के किनारे पर 
गोटे सा लगाने की ख्वाहिश नहीं रखते ,

क्या मै तुम्हारे लिए इस कदर अस्तित्वहीन हूँ कि
तुम्हारी ठहरी हुई आँखों में मुझे देखकर कभी कोई विचलन नहीं होती
या फिर तुम्हारी भावनाएं ही इस कदर नियंत्रित और जड़ हैं 
कि जिनमे मेरी बेचनी भी कभी कोई हलचल नहीं जगा पाती,


परन्तु तुम तो अब तक भी खामोश हो 
शायद तुम्हें खुद का मेरे साथ होने से मेरा सामने होना ज्यादा सुकून देता है 
और ये भी तो हो सकता है कि तुम्हारा तटस्थ मौन ही तुम्हारे प्रेम का सबसे सबल प्रमाण हो .
पर न जाने क्यों एक बार फिर  तुम्हारी ख़ामोशी 
 मुझे  दर्द के  समन्दर में तब्दील करती जा रही है !!




                                   अर्चना "राज "





























 








































Monday, 16 April 2012

मनुष्यत्व

सोच की शब्दों से एक मित्रवत जंग जारी है
सृष्टि के आरम्भ से ही ;
बस कभी कभी आवाज़ ने ही खुद को रोक रक्खा है
इसमें साझेदारी से ,

शब्दों की दुनिया में विचारों की सेंधमारी ने
अकल्पनीय बौखलाहट पैदा की है
तो शब्दों ने भी कलम की मदद से सोच की लकीरों को उकेरकर
उसे उकसाना जारी रक्खा है ;
पर ये कोशिशें  व्यर्थ हैं  तब तक
जब तक की इनकी मित्रता में आवाज़ की भागीदारी न हो ,

सोच ,शब्द और आवाज़ की तिकड़ी  ने ही
जन्म दिया है अब तक
न जाने कितने महायुध्हों और महान क्रांतियों को ,
तो विचारों को बचाए रखने और पालने पोसने का जिम्मा
नीली सियाही से धडकती कलम ने उठा रक्खा है ,

 पर आज न जाने क्यों आवाज़ ने खुद को समेट लिया है
 गले की परिधि के भीतर ही
 पूरी मर्मान्तक चेष्टा के साथ ;
और खुद के कर्तव्य भी
उसे अनाधिकार और अनावश्यक से लगने लगे हैं
न जाने क्यों उसकी चेतना ने
अतिसंयम का लौह बाना पहन रक्खा है ,

परन्तु आज उसे भी ये समझना होगा 
कि हनन और कष्ट तो इंसानों के लिए हैं
क्योंकि उन्ही की मृत्यु निश्चित है ,

परन्तु कभी भी कोई सोच ,कोई शब्द या कोई आवाज़ नहीं मरती;
.रंगों कि लाल - नीली लकीरों में वो हमेशा जीवित रहती है
परिवर्तन की मशाल जलाए रखने के लिए और
क्रांति के  जागृत होने  का आधार बनने के लिए भी ;
और ये उस वक्त तक के लिए है जब तक कि
संसार में मनुष्यता की विचारधारा
एक अधिकारबोध के रूप में कायम है !!


                   अर्चना "राज "





















Sunday, 8 April 2012

ख्वाहिश

मै तुम्हारे घर के दहलीज़ की
वो चौखट हो जाना चाहती हूँ
जो तुम्हारे कदमो के स्पर्श से
न जाने कितनी बार सिहर उठा होगा
पर रुक कर जिसे एक नज़र देखना भी
तुमने कभी गवारा नहीं किया ,

मै एक लम्बी सडक का
वो हिस्सा भी होना चाहती हूँ
जहां तुम हर रात टहलते हुए
कुछ पलों की तन्हाई को जिया करते हो
और जहां तुम्हारे कदमो की थपकियाँ
हर बार मेरी धडकनों में
कुछ और स्पंदन जगा देती हैं ,

मै मील का वो पत्थर होने को भी तैयार हूँ
जहां से तुम हर बार
अनायास ही अपने घर की दूरी नाप लिया करते हो
पर जिसका बदरंग होना तुम्हें नज़र नहीं आता
और न ही दिनों दिन मेरा उम्रदराज़ होना ,

मै तुम्हारे कल्पनाओं की
वो सरहद भी हो जाना चाहती हूँ
जहां तुम्हारी  सोच का हर सिरा
मुझ तक ही आकर थम जाया करे
और मै हर बार
तुम्हारे ख्यालों की रहगुजर से गुजर कर
खुद को गर्वित महसूस कर सकूं ,

तुम्हारी ख़ामोशी से उपजी
वो एक मौन आह भी मै होना चाहती  हूँ
जो तुम्हारे अहसासों में बसकर 
तुम्हारी धडकनों में दर्द की अभिव्यक्ति हो जाया करती है ,


और इसी एकांत  से उपजा
वो एक अश्क भी मै ही होना चाहती हूँ
जो पूरी शिद्दत से थामे रखने के बावजूद भी
तुम्हारी आँखों से छलक ही जाती है
और एक बार फिर मेरा यकीन मुझमे
और गहराने लगता है
की जिस तरह मै भीतर-बाहर से
सिर्फ "तुम "हो जाना चाहती हूँ
शायद वैसे ही तुमने भी मुझे
अपने अंतर्मन में दर्द सा संभाल रक्खा है


और यही सुकून मेरी साँसों में बस जाता है
सदियों तलक तुममे ज़ज्ब हो जाने के लिए !!






                        अर्चना "राज "





















































Friday, 6 April 2012

एक शाम

उदासियों से भरी एक शाम
तेरी सोच ने फिर से
दस्तक दी मेरे ख्यालों में ,

तुझे खुद में समेटूं
या तुझमे ही खोई रहूँ
सोचते हुए ही पूरी शाम
ख़ामोशी से गुजर गयी !!



                         अर्चना "राज "

उलझन

ठहरी हुई दो आँखों की  तासीर
अब भी जगा देती है मुझमे वो तमाम हलचल
जो मुझे लगा था मै वर्षों पीछे छोड़ आई हूँ,

उन दो अदृश्य कदमो की आहट भी सुनाई पड़ती है मुझे
जो मेरे पीछे न जाने कितने पलों की परछाई में बदल जाती थी
जब भी मै भटकती थी यहाँ से वहां अनायास ही ...बेमकसद ,

थमी हुई हवाओं की सरहद
अब भी मौजूद है हमारे बीच सदियों के फासले सी
पर तुम्हारा स्पर्श महसूस हो ही जाता है मुझे
तुम्हारी भिंची मुट्ठियों मे
जो तुमने पलटकर जाने से पहले टांक दिया था
मेरे दर्द के आसमान पर सितारे सा ,

तुम्हारे अक्स में झलकती वो जिद्द भी
मुझे प्रश्नों के सिहरन से भर देती है
जो बार - बार तुम्हें मुझ तक लाती तो रही थी
पर हर  बार तुमने खुद को थाम रक्खा था पूरी शिद्दत से
न जाने क्यों ,

तुम्हारे अहसासों की धूप
जिसे टुकड़े-टुकड़े जोड़कर एक साये में तब्दील कर दिया है मैंने
अब भी भर देता है मेरी सर्द तन्हाई को
अपनी बेचैन गुनगुनी तपिश से ,

तुम अब भी मुझमे ही धडकते और बिखरते हो
सिमटने और खुद को संयमित करने की
अनेकों कोशिशों के बावजूद भी;
और तब मै उस बर्फीले पहाड़ सी हो जाती हूँ
जो लगातार पिघलता तो है
पर कभी भी पूरी तरह दरिया नहीं बन पाता,

यही कशमकश धीरे-धीरे मुझे तुम्हारी
और तुम्हें खुद की तल्ख़ उलझनों में
बदल दिया करती है
हमनफज मेरे !!



                  अर्चना "राज "






































Thursday, 5 April 2012

तुम्हारे लिए

तुम्हारे लिए मै खुद को
धूप का एक ख़ास टुकड़ा बना लेना चाहती हूँ
जो हर रोज मेरे सामने से ही नहीं
मेरे अहसासों से भी गुजरता रहता है
और जो तुम तक
मेरी उत्तप्त साँसों का संदेशवाहक भी  होगा ,

हवाओं की आवारगी भी
मै खुद में सहेजने को तैयार हूँ 
बशर्ते की तुम मुझे अपने आगोश में
संभाले रखने का भरोसा दो ,

बादलों का एक पूरा सैलाब बनना भी मुझे मंजूर है
अगर तुम खुद को
मुझमे भीग जाने की इजाजत दो
बेशक कुछ पलों के लिए ही सही ,

मै वो उद्दाम  नदी भी बनना चाहूंगी
जो हर उस वक्त तुम्हारे अंतस में
पूरे वेग से गुजरे
जब भी तुम खुद को तनहा पाओ ,

मै पहाड़ों की वो धूल बनने को भी राजी हूँ
जो तुम उस पर बैठते वक्त
अपने हाथों से हटाओगे
और तब मै तुम्हारे हथेलियों के स्पर्श में
तुम्हें महसूस कर सकूंगी ,

मै बारिश की वो बूँद भी बन जाना चाहती हूँ
जो अपनी पहली फुहार के साथ
मिटटी में ज़ज्ब होकर
एक अद्भुत खुशबू बिखेरती है
और जिसे तुम अपनी साँसों में भरकर
 अपनी धडकनों का हिस्सा बना सको
और मेरे अस्तित्व की सार्थकता को
एक नया आयाम दे सको ,

मै तुममे यूँ ही घुलकर तुम्हें जीवन
और तुम्हें खुद में समेटकर
खुद को प्रकृति बना लेना चाहती हूँ !!



      अर्चना "राज "








Monday, 2 April 2012

jeena

सहरा की रेत में
मेरे नाम की लकीरें सुलग जाती हैं

समन्दर की लहरों में
मेरी तस्वीर बिखर जाती है

चाहो तो मान लो
कि अब तलक जिन्दा हूँ मै

वरना जीने में
यूँ तो इक उम्र गुजर जाती है !!


           अर्चना "राज "



Saturday, 31 March 2012

ये किसका नाम

हवाओं की सतह पर
संदल की कलम  से लिखा
ये किसका नाम है
बिखर रहा है जो आहिस्ता-आहिस्ता
तमाम कायनात में खुशबू की तरह ,

इस अदृश्य नाम का पुख्ता अहसास
जो भर देता है हम सबको
एक अज़ीम पुरसुकून बेचैन धडकनों से ,

समंदर की लहरों में भी जो
अपना निशान छोड़ जाता है
और जिसे खुद में जज्ब कर लेने की खातिर
लहरें लगातार किनारे से टकराती रहती हैं ,

ओस की चादर के फैलने से पहले ही
मानो धरती को उसकी नमी की आहट मिल जाती है
और उसका पोर-पोर अनायास ही
एक अदृश्य बेचैनी में तब्दील हो जाता है
उसके दामन में खुद को छुपा लेने की खातिर ,

ये किसका नाम है जो
तितलियों के पंखों में
सतरंगी लकीरों से लिखा नज़र आता है
और जिसकी छुअन से ही
वो घबराई हुई सी
भागी-भागी फिरती है ,


किसका नाम है ये
जो पक्षियों को भी
 इस कदर विचलित करने लगा है
की वो अँधेरी रातों में भी
इसकी खोज में भटकते रहते हैं
पर जो कभी नहीं मिलता ,

किसका है ये नाम
और किसने लिखा है
क्या कोई जान पाया है अब तक
या समझ भी पाया है
की आँखें मूंदते ही वो जो इक अक्स
नज़र आता है हम सबको
उसी की गहरी खामोश आँखों में
कहीं हमारे ही नामो के शब्द तो नहीं पल रहे
न जाने कब से
और अब एक स्तब्ध कर देने वाले यकीन के साथ
ये अहसास हममे ठहर सा जाता है
की क्यों हवाओं संग संदल की खुशबू
हममे घुलती रहती है
अपनी पुरसुकून बेचैनी का पिटारा खोले !!


            अर्चना "राज "


























Monday, 26 March 2012

tumhen yaad hai ??

tumhen yaad hai ??

तुम्हे याद है ..मेरे हम्न्फ्ज़ !!
जब हम तुम दोनों बैठे थे यूँ ही
नदी किनारे ... ख़ामोशी से,

तुमने अपनी मुस्कुराती आँखों से देखा था मुझे;
और तुम्हारी उन आँखों में
न जाने कितने जंगल ; पहाड़ ; पक्छी और दरिया
कुछ कहते से लगे थे मुझे .. अर्थ पूर्ण
और मानो सारी सृष्टि ही विहंस पड़ी थी,

अचानक ही न जाने क्या सूझा तुम्हे
की तुमने गीली मिटटी से अपना नाम
मेरी हथेलियों पे लिख दिया
और मेरी मौन हथेलियाँ
बरबस ही स्पंदित हो उठी थीं,

डूबते सूरज की लालिमा ने भी
पूरी सौजन्यता से .. मेरी हथेलियों को
एक अद्भुत आभा से भर दिया था,

तुम्हे याद है
जब विदा के वक्त .. तुमने आहिस्ता से
मेरी हथेलियों पर लिखे खुद के नाम पर
कंपकंपाती उंगलिया फेरी थीं
और तुम्हारी उद्दाम सी चाह
उनमे तरंगित हो उठी थी;
हम दोनों की नम आँखों में भी ,

रात भर मेरी हथेलियाँ
तुम्हारे नाम की मौजूदगी के अहसास से
यूँ धडकती रहीं मानो वहां तुम खुद हो;
और रात भर संभालती रही मै
तुम्हारे हाथों की छुअन को
अपनी धडकनों में,

सुबह तक तुम्हारे नाम की तपिश ने
जज़्ब कर लिया था
मेरे हाथों की लकीरों में पसरी नमी को ;
और तभी कुछ यूँ लगा की
जैसे गीली मिटटी इक रात की उम्र पार कर
तब्दील हो गई है
सुर्ख मेहंदी की रंगत में ;
और उसकी मोहक सी  खुशबू बिखर रही है
तमाम कायनात में ...आहिस्ता - आहिस्ता ,

तुम्हे याद है ;
की फिर जब तुम मिले
तो किस कदर हुलसते हुए
कही थी मैंने तुमसे ये सारी बातें;
पर न जाने क्यों ..अचानक ही
एक सर्द छाया सी गुजर गयी थी ..तुम्हारे चेहरे से ;
और तुम्हारी आँखें सियाही की रंगत में बदल गयी थीं,

तुम्हारे चेहरे पर ;तुम्हारे स्पर्श में
एक साथ कितने ही
प्रश्न उग आये थे ;
कुछ कहा नहीं तुमने
बस एक बार पनीली आँखों से देखा मुझे
और चुपचाप उठकर चले गए थे;
मै भ्रमित सी बस देखती ही रह गयी थी,

तुमने तो उस वक्त ही
हमारे बीच बिखरने वालेदर्द का
एक अनचीन्हा सा आभास दे दिया था मुझे ;
पर जिसका अवश्यम्भावी होना
मैंने आज तक स्वीकार नहीं किया है,

आज तक वो दर्द
राहत का एक किनारा
पाने के इंतज़ार में सिसक रहा है;
और तुम्हारे भीतर उग आये
अनेकों प्रश्नों की वजह जानने की जिज्ञासा
एक निःशब्द चीख की तरह
मेरे चारों और गूँज रही है,

काश ! तुमने मुझे अपना ;
और अपने प्रश्नों का साझीदार बनाया होता
तो शायद
कोई दर्द ; कोई प्रश्न ; या फिर कोई काश !
इस कदर हमारे बीच
नागफनी सा ;खडा नहीं होता,

पर तुमने ऐसा नहीं किया
न जाने क्यों  ?

और अब ये क्यों और तुम्हारा इंतज़ार
मेरी आदतों में शुमार है,

अब तो मेरा वजूद भी
गीली मिटटी से लिखे
तुम्हारे नाम सा हो गया है;
पर इस बार मेहँदी की रंगत ने
उसे एक सीली सी उम्मीद के बोझ से ढक दिया है;
और जिसकी खुशबू तीखी चुभन के साथ
मेरे आस पास तिरती रहती है हर वक्त,

ये सब क्या तुम्हे याद है
या फिर पता भी है   ??
मेरे हम्न्फ्ज़     !!!!!



                               अर्चना "राज "

ishq !

दूर दूर  तक फैले
बर्फ के विस्तृत सीने में इश्क
जब इक ज़ख्म सा उभरा ;

दर्द बेकाबू हुआ
कुछ इस कदर
की बस इक आवाज़ आई
ख्वाबों के चटकने की;

और सर्द अश्कों की रवानी ने
खुद को तब्दील कर लिया
इक बेचैन समंदर में
मेरे हम्न्फ्ज़ .....!!!


अर्चना "राज "

vo mitra !!

vo mitra !!

गुजर चुके कितने ही वर्षों में
मेरी तन्हाई का वो इक अभिन्न मित्र ;
जिसका अक्स हर पल नज़र तो आता था
पर जिसे पहचान नहीं पाती थी मै;
मिल गया मुझे अचानक ही चलते-चलते
जिन्दगी की भीड़ भरी राह घाट में ,

थाम  लिया था
जिसने मेरा हाथ बड़ी ख़ामोशी से
बिना कुछ कहे .. बिना कुछ सुने ;
 साथ ही मेरे बेतरतीब बिखरे अहसासों ;
मेरी तकलीफों और उलझनों को भी;
और कर दिया था मुझे  मुक्त एवम भारहीन;
उस श्वेत पंख की तरह
जो कभी कभी यूँ ही उड़ते हुए
अचानक चेहरे से टकरा जाया करते हैं ,

खुद को चांदनी की तरह
सारी कायनात में
पसरा हुआ महसूस कर रही थी मै;
मासूम दुधमुहें बच्चे की
मुस्कुराहटों सी हो गयी थी मै ;
जी रही थी हर सांस
उसकी  सुरक्षित करने वाली
नर्म मुस्कुराहटों  के साए में ,

पर अचानक ही  कहीं गुम हो गया वो;
उसका होना तो महसूस होता है
पर वो कहीं नज़र नहीं आता मुझे ;
मेरा स्वक्छंद मुस्कुराना
हवा की तरह मेरे अरमानो का भी
पंख लगाकर उड़ना
क्या समझ नहीं पाया वो
या फिर स्वीकार नहीं कर पाया ,

अब तो अहसासों की इस सातवीं परत को भी
मैंने अपनी पीड़ा की पर्ची के साथ
अपनी तकलीफों के बक्से में बंद करके
अपने मन की चौखट में छुपा दिया है ;
और उसके ताले की चाभी
अदृश्य तौर पर आहिस्ता से
उसके ही हाथो में थमा दी है मैंने;
ठीक उसी तरह
जिस तरह ख़ामोशी से उसने
मेरे हाथों को थामा था ,

न जाने वो कभी भी अपनी हथेलियों में
उस चाभी का होना महसूस कर पायेगा या नहीं ;
पर मै प्रतीक्छा करूंगी तब तक
जब तक वो पूरे दिल से मुस्कुराकर
उस ताले को नहीं खोलता;
और मेरे अहसासों .. मेरे अरमानो को
एक खुला आसमान देने का हौसला नहीं रखता
जहां मै उसके साथ मुक्ति को अपने चरम पर जी सकूं ..!!


                                archanaa raj !!

dard

सुलगते दर्द का सुर्ख अँधेरा
जला करता है
शब् भर मुझमे
कुछ इस कदर ;

कि बदल जाती हूँ मै
दरिया-ए- शबनम में
और बिखर जाती हूँ
सारी कायनात में
नाकाम तबस्सुम जैसी ....!!!


शबनम - ओस
कायनात -जहाँ
तबस्सुम - हंसी


                 अर्चना "राज "

चाहत

तेरी चाहत का आइना पिघलकर
जब मेरी रगों में
गर्म तबस्सुम सा बिखरने लगता है ;

नज़र आने लगती हूँ मै भी लोगों को
सुर्ख कांच की
इक बेजान मूरत जैसी;

साँसें तो चलती हैं
पर दिल धडकता नहीं है मेरा ;

जैसे बेचैन से समंदर में
इक मोती .. सदियों तक
ठहरे हुए अश्क सा पलता है ..!!!


                     अर्चना "राज "

बेड़ियाँ

 ठहरो ज़रा
सवालों का सिलसिला अब तक बदस्तूर जारी है 
करो इंतज़ार जवाबों के आने का  ज़रा कुछ और अभी ,

 सवालों को
अभी कुछ और पकने दो
जलने दो
कुछ और सुलगने दो वक्त की भट्ठी में ,

जवाबों की दहलीज़ अभी बहुत दूर है
टिकी है जो हालातों के काँधे पर सर टिकाये ,

संस्कारों औए परम्पराओं की कड़ियाँ
एक-एक कर बांधती रही हैं
अब तक सोच और शब्दों की आज़ादी को
और सिमटते रहे हैं तमाम क्यों
डायरी के पन्नो तक ही
उस दिन का इंतज़ार करते हुए
जिस दिन ये क्यों
वक्त की भट्ठी से निकलकर
या फिर कसी बेड़ियों के धीरे - धीरे बिखरने की उम्मीद में
जवाबों की दहलीज़ के नज़दीक पहुँच जाएँगे  ,

जहां सवाल सिर्फ सवाल होंगे
संदेह के शीशे से बना चश्मा नहीं
और जवाब भी सिर्फ जवाब होगा
शायद की सतह पर बिखरी रेत नहीं 
 जो भी होगा  मुकम्मल होगा  ..आधा- अधूरा नहीं ,

ये सवाल दर सवाल उलझती जिन्दगी 
जवाबों की दहलीज़ कभी न कभी तो पार करेगी ही 
जहां खिली धूप सा यकीन बाहें पसारे खडा होगा 
और जो सभी जनमते सवालों पर आश्वस्ती के 
मुस्कानों को चस्पां कर देगा ,


जिन्दगी फिर किसी सवालों के दायरे में बंधी नहीं होगी
बल्कि उन्मुक्त उड़ान के लिए तमाम आसमान भी 
जहां बाहें पसारे इंतज़ार में ठहरा होगा ...!!








                  अर्चना "राज "


















 







 










Sunday, 25 March 2012

jindegi

jindegi


जिंदगी के कदम
     थमकर चलते हुए भी
आज हमारे साथ हैं ,

वो लम्हा भी साथ है
  जब हम एकाकी होते थे .....

हाथ पकडे पर खुद में खोये हुए

 मीलों चलने तक तलाशते
     इस जीवन का सच .....

और अंत में
       बेचारगी से हंस देते ,

प्रश्नों के उत्तर से कतराती
  मौन आँखें ,

शर्मिंदा न होने देने की कोशिश
   कितना बेचारा कर जाती ,

इनसे बचने के लिए हम
     एक बार फिर
जिन्दगी की रंगीनियाँ पाने
    दौड़ पड़ते ........

इन्हीं थमकर चलते कदमो से            !!!

           अर्चना" राज "

yaaden

yaaden

मुट्ठी भर धुप 
      अंतस में उजाला कर गयी ;

दिल को
        अहसासों से  भर गयी ;

तुम्हारी याद आई .............
बहुत ...........................बहुत .........................

गीली आँखों में जो
       दर्द की तरह समां गयी........

     तुम्हारी आँखें
खामोश ....ताका  करती  थी ;

      तुम्हारी आँखें
कितनी ही बातें किया करती थीं;

सोचते ..........गुनते .............सहेजते
कब शाम हुई...............
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रात भी ढल गयी ...
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और जो देखा तो..........

चांदनी सिमटी पड़ी थी

आकाश की बाहों में ...........................
..................
एक दर्द ........
................
अब अन्तेर्मन में........
.................

तैर गया .............बिखर गया............

मै हंस दी ...............

उन्ही गीली आँखों से ...................!!!!!!!!!!!!


                             अर्चना "राज "