Tuesday, 17 July 2012

ग़ज़ल

तेरी नीमबाज़ आँखों में ये कैसा अब्र उतर आया है
जिसकी बेहिसाब बारिशों में भीग जाने को जी चाहता है ,

कशमकश तो यूँ भी बहुत है जिन्दगी में लेकिन
तेरे इश्क में दम-ब-दम जज़्ब हो जाने को जी चाहता है ,

सूरत ख्वाबों की तो यूँ हर रोज बदल जाती है
हर ख्वाब में पर अब तेरा ही दीदार हो ये जी चाहता है ,

तेरी साँसों को कैद करूं या गुम हो जाऊं तुझमे ही 
आहिस्ता-आहिस्ता यूँ फना हो जाने को जी चाहता है , 

हवाओं पे तेरा नाम लिखकर चूमा करूं निगाहों से 
हर ज़र्रा कायनात का तेरे नाम करने को  जी चाहता है !!



                             अर्चना राज 

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