Friday, 1 February 2013

अंतिम इक्छा

देह ऊर्जा चुक गयी
धड़कने फिर भी जिंदा हैं,

कोठरी ,दरवाजे और चौखट विरासत से  हैं
छतों से पर दरकने की आवाज़ सुनाई देती है
वक्त हो चला है ,

मोतियाबिंद चिलमन सा उतर आया है
घुटने अब भी कशमकश मे हैं
और झुर्रियां उम्र के दस्तावेज़ सी
हस्ताक्षर की जगह खाली है बस
जल्द ही भरेगी ,

ज़िंदगी ---कोई आस ,कोई अपेक्षा अब नहीं तुझसे
कि मौत जब भी आना खुली बाहों से आना
मिलन होगा ...... रूहानियत कि हद तक ,

ज़रा सी चाहिए मोहलत मुझे पर ----क्या करूँ
सरहद पार ही अटकी हैं सांसें
मेरे बच्चे अभी आने हैं बाकी
ज़रा ठहरो उन्हें अपने कलेजे से लगा लूँ
चलूँगी फिर तुम्हारे साथ इक लंबे सफर पर !!


                   अर्चना राज 

1 comment:

  1. बहुत सुन्दर, भावुकता की हिलौरे मारती , जागती शब्दों में सोती ज़िन्दगी!

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